(सुप्रीम कोर्ट)
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों) संशोधन अधिनियम 2026 की धारा 2 (k) के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर याचिकाकर्ता से जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है. सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने यह निर्देश दिया है.
मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम में 2026 के संशोधन से पहले जिन लोगों को ट्रांसजेंडर पहचान कार्ड जारी किए गए थे, वे मान्य रहेंगे. इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों चिंता व्यक्त किया था. उसके बाद सरकार ने कोर्ट को यह भरोसा दिया है.
सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसजेंडर पहचान से जुड़े मामलों पर सुनवाई
कोर्ट ने केंद्र सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड पर ले लिया है. सुप्रीम कोर्ट उन मामलों पर विचार करेगा, जिनमें तीजी कार्ड कथित तौर पर रद्द या अस्वीकार कर दिए गए हैं, और उन लोगों की स्थिति पर भी जिनके आवेदन लंबित थे. नए संशोधित बिल के मुताबिक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अब अपनी पहचान खुद तय करने का अधिकार नही होगा, ट्रांसजेंडर पहचान के लिए मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आवश्यक होगी. ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ अपराधों के लिए सख्त सजा हो सकती है. ऐसे में खुद को ट्रांसजेंडर मानने वाले लाखों लोग इस कैटेगरी से बाहर हो जाएंगे.
2019 के एक्ट में यह प्रावधान था कि कोई भी शख्स अपनी इच्छा से खुद को ट्रांसजेंडर घोषित कर सकता था और उसके बाद उसे डीएम से सर्टिफिकेट मिल जाता है. लेकिन अब यह व्यवस्था समाप्त हो गई है और मेडिकल टेस्ट कराना जरूरी कर दिया गया है. मेडिकल टेस्ट के बाद ही डीएम किसी को ट्रांसजेंडर का सर्टिफिकेट दे पाएंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने नालसा बनाम भारत संघ 2014 के केस में यह फैसला सुनाया था कि खुद की पहचान मौलिक अधिकार है. कोई भी व्यक्ति यह तय कर सकता है कि वह पुरुष है, महिला है या फिर ट्रांसजेंडर है. इसके लिए किसी मेडिकल जांच की जरूरत नही है. साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय कानून सेवा प्राधिकरण से जुड़े फैसले में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को मान्यता दी थी.
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-भारत एक्सप्रेस
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