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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पत्नी से सिर्फ 13 दिन बात न करना क्रूरता नहीं, आरोपी पति को किया बरी

Supreme Court Judgement: SC ने फैसले कहा कि पति-पत्नी के बीच मतभेद होना सामान्य है और सिर्फ 13 दिनों तक बातचीत न करना क्रूरता नहीं माना जा सकता. जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस चंदूरकर की पीठ ने मद्रास HC के फैसले को पलटते हुए आरोपी को बरी किया.

Supreme Court
Edited by Shubhra Rai

Supreme Court Judgement: सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला देते हुए कहा कि पति-पत्नी के बीच मतभेद होना वैवाहिक जीवन का सामान्य हिस्सा है. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ 13 दिनों तक बातचीत न करना अपने आप मे क्रूरता नही माना जा सकता है जस्टिस जेके महेश्वरी और जस्टिस अतुल एस चंदूरकर ने इस आधार पर 498A के आरोपी को दोषमुक्त कर दिया है. मद्रास हाईकोर्ट ने पत्नी के साथ क्रूरता करने का दोषी ठहराते हुए तीन साल की सजा सुनाई थी.

अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को क्रूरता का दोषी ठहराने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि उसका व्यवहार इतना गंभीर था कि उससे महिला आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो सकती थी, या उसके मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर खतरा पैदा हो सकता था. केवल 13 दिनों तक पत्नी से बात न करना, बिना किसी ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य के क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता.

हेज की मांग और मानसिक उत्पीड़न कीा मामला

बता दें कि जयेश कन्ना की पत्नी संगीता की मृत्यु से जुड़ा है. संगीता ने 31 जनवरी 2015 को अपने मायके में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. अभियोजन पक्ष का आरोप था कि विवाह के बाद उसे दहेज की मांग और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा. निचली अदालत ने आत्महत्या और दहेज उत्पीड़न से जुड़े आरोपों में पति के अन्य परिजनों को बरी कर दिया था.

मायके जाने के बाद बात न करना मानसिक क्रूरता

वही पति को धारा 304 B के आरोप से आरोप मुक्त कर दिया गया. लेकिन धारा 498 A के तहत दोषी ठहराया गया. अदालत ने माना था कि पत्नी के मायके जाने के बाद पति द्वारा उससे बात न करना मानसिक क्रूरता के दायरे में आता है. अदालत ने यह भी कहा कि पति उस समय मस्कट में था और पत्नी का उसके साथ जाना पासपोर्ट और वीजा संबंधी औपचारिकताएं पूरी न होने के कारण संभव नहीं हो पाया था.

मानसिक रूप से परेशान होकर आत्महत्या

यह भी आरोप था कि पति ने महिला के मायके जाने पर नाराजगी जताई और फोन पर उससे बात करना बंद कर दिया, जिससे वह मानसिक रूप से परेशान होकर आत्महत्या करने पर मजबूर हुई. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि आपराधिक मामलों में आरोप साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है और उसे संदेह से परे जाकर आरोप सिद्ध करने का होता है.

इस मामले में ऐसा नहीं हो सका, इसलिए पति की सजा दोषसिद्धि को रद्द कर दिया गया.

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भारत एक्सप्रेस



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