मिठाइयों की दुनिया में नाम आते ही सबसे पहले जो मिठाई दिमाग में आती है, वो गुलाब जामुन है. गोल, नरम और चाशनी में डूबी ये मिठाई हर त्योहार और शादी की शान है. दुकानों की शॉपिंग हो या घर में बनाने की तैयारियां, गुलाब जामुन हमेशा पसंदीदा रहता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये मिठाई कोई सोच-समझकर बनाई गई खास रेसिपी नहीं थी, बल्कि एक तरह की जरूरत और जुगाड़ का नतीजा थी?
इतिहासकारों के अनुसार, गुलाब जामुन का जन्म लगभग 400 साल पहले मुगल काल में हुआ. यह कहानी हमें शाहजहां (1628-1658) के दरबार तक ले जाती है. उस समय मावा (खोया) को लंबे समय तक सुरक्षित रखना बड़ी चुनौती थी. फ्रिज जैसी सुविधाएं नहीं थीं, और अगर मावा जल्दी खराब हो जाता तो पूरी मेहनत बेकार हो जाती.
यही सोचकर शाही बावर्ची ने मावे के छोटे-छोटे गोले बना कर उन्हें घी में तलने और खुशबूदार चाशनी में डुबोने का प्रयोग किया और ये इतना सफल रहा कि इसे मुगल दरबार की शाही मिठाई बना दिया गया.
गुलाब जामुन का सफर सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं रहा. इसके सुरुआती रूप का संबंध ईरान की 13वीं सदी की मिठाई ‘लुकमत-अल-कादी’ से माना जाता है. फारसी में इसे ‘लुक्मा’ कहा जाता था. जब यह भारत आई, तो स्थानीय रसोइयों ने इसे पूरी तरह बदल दिया. अरबी देशों में आटे के घोल से बनने वाली यह मिठाई भारत में मावा और खोया से बनाई जाने लगी, जिससे इसका स्वाद और भी मखमली और नरम हो गया.
कैसे पड़ा इसका नाम ‘गुलाब जामुन’?
गुलाब जामुन का नाम भी बेहद रोचक है. ‘गुलाब’ फारसी शब्द ‘गुल’ (फूल) और ‘आब’ (पानी) से आया है, जो गुलाब जल वाली चाशनी को दर्शाता है. ‘जामुन’ इसकी आकार और गहरे रंग के कारण पड़ा. समय के साथ, भारत के अलग-अलग हिस्सों ने इसे अपने स्वाद और जरूरत के अनुसार ढाला है. बंगाल में इसे ‘पंतुआ’ या ‘लेडी केनी’ कहा जाता है, जिसमें पनीर का मिश्रण भी होता है. वहीं काला जामुन का वर्जन भी है, जिसे लंबे समय तक तला जाता है ताकि बाहर से हल्का कुरकुरा और अंदर से नरम रहे.
आज गुलाब जामुन सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली मिठाई है. एक गलती से शुरू हुई ये मिठाई आज दुनिया के स्वाद पर राज करती है, और हर त्योहार की मिठास में चार चांद लगा देती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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