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चंदर-सुधा के अमर प्रेम के पीछे छिपा है एक और गहरा सच! ‘गुनाहों का देवता’ के बाद क्यों ज़रूर पढ़ी जानी चाहिए ‘रेत की मछली’?

मेरे द्वारा की गई साहित्यिक समीक्षा: ‘गुनाहों का देवता’ और ‘रेत की मछली’ उपन्यासों के झरोखे से मानवीय संबंधों, निश्चल प्रेम और स्त्री की मौन वेदना का एक मार्मिक विश्लेषण.

Gunahon Ka Devta Book Review
Vijay Ram Edited by Vijay Ram

हम चले जाएंगे अपनी सारी मोहब्बत लेकर
तुम बैठे रहना यह गुरूर लेकर कि तुम्हें चाहने वाले बहुत हैं…

ये पंक्तियाँ आज भी हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध उपन्यास ‘गुनाहों के देवता’ पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं. इसमें धर्मवीर भारती अपने प्रेम की पराकाष्ठा को दिखाने की कोशिश करते हैं और चंदर को ‘देवता’ के रूप में गढ़ते हैं. लेकिन कभी-कभी एक पुस्तक दूसरी पुस्तक का उत्तर नहीं, बल्कि एक नया प्रश्न बनकर सामने आती है.

जब मैंने पहली बार ‘गुनाहों का देवता’ पढ़ा, तो मेरी आँखें नम हो गईं. मुझे इसे पढ़कर यही अनुभूति हुई कि चंदर और सुधा का प्रेम हिंदी साहित्य की सबसे निर्मल और मार्मिक अभिव्यक्तियों में से एक है. धर्मवीर भारती ने चंदर के चरित्र को इस प्रकार रचा है कि उसकी समस्त कमजोरियों और अंतर्विरोधों के बावजूद पाठक उसके लिए अपने मन में एक विशेष स्थान बना लेता है. वहीं, सुधा का निश्चल प्रेम और समर्पण उसे देवत्व के निकट पहुँचा देता है.

लेकिन… जब मैंने इसे पढ़ने के बाद अपनी पहली समीक्षा लिखी और अपने अत्यंत प्रिय व वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय विनीत भैया को भेजी, तो उन्होंने मुझसे कहा, “बाबू, अगर सच में दोनों पक्षों को समझना है, तो तुम्हें कांता भारती का उपन्यास ‘रेत की मछली’ ज़रूर पढ़ना चाहिए.” मैंने उसी दिन यह किताब मंगवाई और पढ़ना शुरू किया.

‘रेत की मछली’ पढ़ने के बाद मेरे भीतर अनेक प्रश्न उठने लगे. एक तरह से देखा जाए तो यह मेरी सिर्फ एक पाठकीय अनुभूति है, इसमें मेरा कोई अंतिम साहित्यिक निष्कर्ष नहीं है. यह बिल्कुल संभव है कि कोई दूसरा पाठक इन दोनों उपन्यासों को अपनी भिन्न दृष्टि से पढ़े. लेकिन मुझे इन्हें पढ़कर यह अनुभव हुआ कि जहाँ ‘गुनाहों का देवता’ प्रेम की अंतिम ऊँचाइयों को स्पर्श करता है, वहीं ‘रेत की मछली’ दो लोगों के संबंधों के भीतर छिपे उस मौन दर्द को सामने लाती है, जो प्रायः समाज को दिखाई नहीं देता.

इस उपन्यास को पढ़ते हुए सबसे अधिक पीड़ा मुझे तब हुई, जब मुख्य पात्र शोभन की महत्त्वाकांक्षाएँ और उसका आत्ममोह, कुंतल की मौन यातना पर भारी पड़ते दिखाई दिए. शोभन के जीवन में जिस प्रकार से दूसरी स्त्री की उपस्थिति होती है, वह केवल एक घटना नहीं रह जाती, बल्कि एक पत्नी के आत्मसम्मान पर निरंतर पड़ने वाली एक गहरी चोट बन जाती है. जिस स्त्री को अपने ही पति के जीवन में— जिसके साथ वह सात जन्मों का वादा करके आती है— धीरे-धीरे पराया होने का एहसास होने लगे, उस वेदना को शब्दों में व्यक्त करना सरल नहीं है. संभवतः उसे वही समझ सकता है जिसने या तो उसे जिया हो या फिर बहुत गहराई से महसूस किया हो.

इस उपन्यास का वह प्रसंग आज भी मुझे भीतर तक विचलित कर देता है, जब कुंतल के पिता उसे अपने साथ सम्मानपूर्वक ले जाने के लिए दामाद शोभन के घर आते हैं. घोर अपमान और उपेक्षा सहने के बाद भी वह पिता के साथ नहीं जाती. वह एक भारतीय स्त्री की मर्यादा और गृहस्थी का पालन करती है. अपने संस्कारों, विवाह, सामाजिक लोक-लाज और रिश्तों की गरिमा के बीच स्वयं को बाँधे रखती है. उस क्षण उसकी चुप्पी शब्दों से कहीं अधिक मुखर होती है. वह केवल एक स्त्री की चुप्पी नहीं, बल्कि एक पूरे समाज की चुप्पी साबित होती है.

इसे पढ़ते-पढ़ते मुझे बार-बार यही अनुभूति हुई कि आज भी हमारे समाज में अनेक स्त्रियाँ रिश्तों के भीतर ऐसी ही अनकही पीड़ाओं के साथ जी रही हैं; जहाँ हर कहानी का अंत भले ही कोई बड़ी त्रासदी न हो, लेकिन हर मौन अपने भीतर एक लंबा संघर्ष अवश्य समेटे रहता है.

मैं धर्मवीर भारती की साहित्यिक ऊँचाई का उतना ही सम्मान करता हूँ, जितना ‘रेत की मछली’ पढ़ने के बाद कांता भारती की लेखकीय संवेदनशीलता का. मेरी दृष्टि में ये दोनों रचनाएँ एक-दूसरे का विरोध नहीं करतीं, बल्कि मनुष्य और संबंधों के दो भिन्न-भिन्न सत्य हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं. एक जहाँ प्रेम की पराकाष्ठा दिखाती है, तो दूसरी उसी प्रेम की अनकही कीमत चुकाती हुई नजर आती है.

यदि ‘गुनाहों का देवता’ पढ़कर आपकी आँखें नम हुई थीं, तो एक बार ‘रेत की मछली’ भी ज़रूर पढ़िए. संभव है इस बार आपकी संवेदनाएँ किसी और दिशा में प्रवाहित हों. शायद इस बार आँसू केवल प्रेम के लिए नहीं, बल्कि उस स्त्री के लिए भी आएँ, जिसकी पीड़ा प्रायः इतिहास, आज के समाज और साहित्य की तड़क-भड़क में कहीं पीछे छूट जाती है.

सच कहूँ तो शुरू से मुझे पढ़ाई-लिखाई का बहुत शौक नहीं था, लेकिन मैंने विकास दिव्यकीर्ति सर के हिंदी साहित्य के कुछ व्याख्यान (वीडियो) देखे और उसके बाद पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा. वहीं से हिंदी साहित्य में मेरा रुझान बढ़ा. इसी साहित्य ने मुझे मनुष्य को पढ़ना सिखाया है. अब तक करीब 10 से 15 उपन्यास पढ़ने के बाद भी कुछ रचनाएँ मेरे मन में स्थायी स्थान बना चुकी हैं, जिनमें ये दोनों कृतियाँ अत्यंत विशेष हैं. ‘गुनाहों का देवता’ जहाँ प्रेम की निर्मलता के कारण स्मरणीय है, तो ‘रेत की मछली’ स्त्री की मौन वेदना के कारण प्रासंगिक है.

साहित्य को पढ़कर मेरा यह दृढ़ विश्वास और मजबूत हुआ है कि ऐसे कालजयी साहित्य को अधिक से अधिक पढ़ा जाना चाहिए— विद्यालयों में, पुस्तकालयों में, सोशल मीडिया पर, और हर उस मंच पर जहाँ मनुष्य अपने भीतर के मनुष्य से संवाद कर सके. क्योंकि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं करता, वह हमारे भीतर संवेदना, आत्ममंथन और मानवीयता का निर्माण भी करता है.

बाकी आगे और भी कई उपन्यासों को पढ़ने की यह निरंतर प्रक्रिया चलती रहेगी और मैं अपने विचारों को शब्दों के माध्यम से आपके बीच साझा करता रहूँगा.



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