83 वर्ष की उम्र में भारतीय फोटोग्राफी के महान शिल्पकार रघु राय का आज यानी 26 अप्रैल को निधन हो गया. उनके परिवार ने इंस्टाग्राम पर इस दुखद समाचार की पुष्टि की.
वरिष्ठ कला विश्लेषक सुमन सिंह सोशल मीडिया पर लिखते हैं : अपने छात्र जीवन में पहली बार जब ये नाम सुना था, तो उसका सीधा सा मतलब था- अगर फोटोग्राफर बनना है तो रघु राय जैसा बनो. रघु राय द्वारा ली गई तस्वीरें फोटोग्राफी का व्याकरण बन चुकी थीं. ये पिछली सदी के नब्बे के दशक की शुरुआती वर्षों की बात है. हमारे कला महाविद्यालय में अगर कोई छात्र अपने कैमरे से कोई अच्छी तस्वीर ले आता, तो चर्चा के दौरान रघु राय, रघुबीर सिंह और एस. पॉल का नाम अनिवार्य रूप से आ जाता. तीनों नाम भारतीय फोटोग्राफी की त्रिमूर्ति जैसे लगते थे, लेकिन रघु राय उसमें सबसे चमकदार सितारे थे.
फोटोग्राफी की दुनिया के स्टार
अखबारी दुनिया की बात करें तो वहां कार्यरत अधिकांश फोटोग्राफरों की एक आम दलील होती थी कि अखबार या पत्रिका में उनके छायाचित्रों को वैसी जगह नहीं मिल पाती, जैसी रघु राय की तस्वीरों को मिला करती थी. सच तो ये है कि वे फोटोग्राफी की दुनिया के ऐसे स्टार थे, जिनकी तस्वीरों को जानना फोटोग्राफी का अघोषित पाठ्यक्रम बन चुका था. उनकी छवियां केवल घटनाओं को दर्ज नहीं करती थीं, बल्कि भारत की आत्मा को, उसके दर्द को, उसकी जीवंतता को और उसके सौंदर्य को कैद कर लेती थीं.
कैसे हुई फोटोग्राफी करियर?
18 दिसंबर 1942 रघु राय का जन्म पाकिस्तान के झांग में हुआ था. उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, लेकिन 1965 में भाई एस. पॉल के प्रभाव से फोटोग्राफी में कदम रखा. 1966 में वे द स्टेट्समैन अखबार के चीफ फोटोग्राफर बने. 1971 में पेरिस में उनकी प्रदर्शनी देखकर हेनरी कार्तिए-ब्रेसां इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने रघु राय को Magnum Photos में नामांकित किया. 1977 में वे इसके सदस्य बने. ये भारतीय फोटोजर्नलिज्म के लिए एक मील का पत्थर था.
कई पुरस्कारों से सम्मानित
उनकी तस्वीरें हमेशा ‘क्षण की जादू’ को पकड़ती थीं. भोपाल गैस त्रासदी (1984) की वह भयावह छवियाँ, बांग्लादेश मुक्ति संग्राम (1971) के शरणार्थी, इंदिरा गांधी और मदर टेरेसा जैसे व्यक्तित्वों के अंतरंग पोर्ट्रेट, दलाई लामा, सत्यजीत रे, बिस्मिल्लाह खान- हर फ्रेम में जीवन की गहराई झलकती थी. वे भारत के रोजमर्रा के जीवन, त्योहारों, ग्रामीण परिदृश्यों और राजनीतिक क्षणों को भी इतनी संवेदनशीलता से कैद करते थे कि देखने वाला खुद को उस पल का हिस्सा महसूस करने लगता.
उन्हें पद्म श्री (1972), नेशनल ज्योग्राफिक का “फोटोग्राफर ऑफ द ईयर” पुरस्कार और फ्रांस सरकार का Officier des Arts et des Lettres समेत कई सम्मान मिले. उनकी किताबें जैसे Raghu Rai’s India: Reflections in Colour और Reflections in Black and White आज भी फोटोग्राफी के छात्रों के लिए बाइबिल की तरह हैं.
विशिष्टता ही उनकी पहचान
अपनी विधा के कद्दावर लोगों में शुमार रघु राय ने आजादी के बाद भारत की कई महत्वपूर्ण घटनाओं को अपने कैमरे में कैद किया. संभवतः देश में पहली बार किसी के लिए फोटो एडिटर का पद सृजित किया गया, इससे उनके महत्व को समझा जा सकता है. फोटोग्राफी के क्षेत्र में कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित पद्मश्री रघु राय श्वेत – श्याम फोटोग्राफी में जैसी गहराई देते थे वैसा बहुत कम छायाकार ही कर पाते थे. यहां उनकी विशिष्टता थी.
बड़े भाई एस पौल से वे बहुत कुछ सीख ही रहे थे कि लंदन के टाइम्स अखबार में उनकी खींची ‘ बच्चा गदहे ‘ की फोटो ने उन्हें रातों-रात सितारा बना दिया.
एक ही नजर से देखा और दिखाया
हेनरी कार्तिए ब्रेसां की फोटोग्राफी के वे नये संस्करण माने गए जिनका महात्मा गांधी के निधन के समय एक फोटो बहुत चर्चित हुआ था ‘आल द लाइट्स हैज गौन ‘. ब्रेसां ने ही उन्हें ‘ मैग्नम ‘ फोटो से जोड़ा, फिर वे स्टेट्समैन होते हुए ‘इंडिया टुडे’ के फोटो एडीटर बने. भारतीय पत्रकारिता में किसी फोटोग्राफर को मिला ये पहला महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है.
भारत को रघु राय ने एक अलग ही नजर से देखा और दिखाया. कितने ही फोटो याद आते हैं… गंगा में खड़ी स्त्री जिसके ऊपर से परिंदा उड़ गया है, यमुना किनारे ताजमहल के पास से गुजरती बैलगाड़ी, आपातकाल, भोपाल गैस त्रासदी.
रघु राय के बाद के समय के फोटोग्राफ्स की खूबी है बादल के टुकड़े का प्रवेश. मेघ किसी न किसी कोने में आ ही जाता था. फोटोग्राफी उनके लिए प्रार्थना बन गई थी.उनके फोन की घंटी में कुमार गंधर्व का स्वर गूंजता था. कवि शंख घोष की कविता का ‘ मेघ जैसा मनुष्य ‘ उनमें झलकता था. पता नहीं अब फोटोग्राफी में उनकी तरह मेघ को कौन देखेगा और छायाचित्रों में लाएगा.
भारत के दृश्य इतिहासकार
रघु राय सिर्फ फोटोग्राफर नहीं थे, बल्कि भारत के दृश्य इतिहासकार थे. उन्होंने कैमरे के जरिए देश की कहानी लिखी, जो शब्दों से ज्यादा प्रभावशाली थी. उनकी तस्वीरों में तकनीक नहीं, बल्कि दिल की धड़कन थी. वे कहते थे कि कैमरा हमेशा उनके साथ रहता है. आज उनका कैमरा चुप है, लेकिन उनकी तस्वीरें हमेशा बोलती रहेंगी.
जिनकी तस्वीरें फोटोग्राफी का व्याकरण बन चुकी हैं, वे चले गए, लेकिन उनका वो व्याकरण देखने का सही तरीका और महसूस करने का सही अंदाज पीढ़ी दर पीढ़ी सिखाता रहेगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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