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क्या है केदारनाथ मंदिर का रहस्य? 6 महीने बंद कपाट के अंदर आखिर कैसे जलता है दीप, बेहद दिलचस्प है इसके पीछे का रहस्य

केदारनाथ मंदिर को लेकर कई अद्भुत रहस्य और मान्यताएं हैं. साल में केवल छह महीने खुलने वाले इस ज्योतिर्लिंग मंदिर में बंद रहने के दौरान भी दीपक जलता रहता है और घंटियों की आवाज सुनाई देती है.कहा जाता है कि इन महीनों में स्वयं देवता यहां पूजा करते हैं.

Edited by Akansha

Kedarnath Temple: केदारनाथ मंदिर को लेकर हिंदुओं में कई मान्यताएं हैं, कहा जाता है कि केदारनाथ में स्थित ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से व्यक्ति के लिए मोक्ष के द्वार खुलते हैं. यह मंदिर साल में बस 6 महीने ही खुलता है जिसमें भक्त दर्शन कर पाते हैं, लेकिन बंद मंदिर के अंदर दीपक खुद-ब-खुद जलता रहता है.आखिरी कौन उन 6 महीनों के दौरान मंदिर के अंदर पूजा करता है.आइए जानते हैं केदारनाथ मंदिर से जुड़े कुछ हैरान कर देने वाले रहस्य.

भगवान शिव को समर्पित 12 ज्योतिर्लिंग में से एक केदारनाथ मंदिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है. यह स्वयंभू शिवलिंग मंदिर का निर्माण पांडवों के पौत्र महाराज जनमेजय ने कराया था, और इस मंदिर का जीर्णोद्धार आदि शंकराचार्य ने कराया था.

भगवान नर नारायण और दक्ष प्रजापति के समय से उनके पूर्वज पुरोहित इस क्षेत्र में पूजा करते आए हैं. पूजा करने का अधिकार और संपूर्ण केदार क्षेत्र उन्हें पांडवों के पौत्र राजा जनमेजय ने दिया था. शंकराचार्य के वंशज जो केदारनाथ के मुख्य पुजारी हैं, वहां पूजा नहीं कराते बल्की दूसरों पुजारियों को निर्देश देकर पूजा कराते हैं.

ज्योतिर्लिंग के आगे के हिस्से पर भगवान गणेश के साथ मां पार्वती का श्री यंत्र भी स्थित है साथ ही पिछले भाग पर प्राकृतिक स्फटिक की माला देखी जा सकती है. यहां हजारों वर्षों से एक दीपक जल रहा है, जब मंदिर छह महीने के लिए बंद कर दिया जाता है उस समय भी यह दीपक अपने आप जलता रहता है.

भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण ऋषि के तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान स्वरुप भगवान शिव सदा के लिए ज्योतिर्लिंग रूप में केदारनाथ में वास कर गए.

केदारनाथ को लेकर एक अन्य मान्यता यह भी है कि जब असुरों ने देवताओं पर आक्रमण किया तो तब असुरों से बचने के लिए देवताओं ने भगवान शिव की आराधना की, तब भगवान शिव ने बैल स्वरूप में देवताओं से कहा कोदारम यानी किसी चीरूं किसे फाडूं और असुरों का सींगों और खुरों से नाश कर दिया और मंदाकिनी नदी में फेंक दिया. केदारनाथ का नाम कोदारम से ही पड़ा है.

केदारनाथ मंदिर के पास एक रेतस नाम का कुंड है, जहां ओम नम: शिवाय बोलने पर पानी में बुलबुले उठते हैं, मान्यता है कि इस कुंड का पानी पीने से व्यक्ति को मोक्ष मिलता है, केदारनाथ की यात्रा जहां से आरंभ करते हैं तो वहां गौरी कुंड स्थित है, जिसका पानी हमेशा गर्म रहता है, मान्यता है कि इस कुंड के पास माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या की थी. उस समय ही यहां गरम पानी स्रोत प्रकट हुआ था. यहां स्नान करने के बाद ही केदारनाथ की यात्रा आरंभ होती है.

जब मंदिर 6 महीने के लिए बंद रहता है तो उन छह महीनों में भी दीप अपने आप जलता है. मंदिर के आसपास रहने वाले बताते हैं कि मंदिर के कपाट बंद होने के बाद भी मंदिर के अंदर से घंटी बजने की आवाज आती है. पुराणों के अनुसार, इन छह महीनों में देवता गण यहां पूजा करते हैं, यानी मंदिर 6 महीने मनुष्यों के लिए खुला रहता है और बाकी छह महीने देवताओं के लिए.

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-भारत एक्सप्रेस 



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