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ISRO BRICS Satellite: नासा (NASA) के अलावा अब दुनिया की निगाहें एक नए अंतरिक्ष सहयोग पर हैं. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और BRICS देशों की स्पेस एजेंसियां मिलकर एक ‘वर्चुअल सैटेलाइट नेटवर्क’ (Virtual Satellite Constellation) तैयार कर रही हैं. यह कोई एक बड़ा नया रॉकेट या स्पेसक्राफ्ट नहीं है, बल्कि BRICS देशों के मौजूदा अर्थ-ऑब्जर्वेशन (पृथ्वी निगरानी) उपग्रहों का एक साझा नेटवर्क है.
इसका मुख्य उद्देश्य जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं, जल संसाधनों और कृषि पर नज़र रखना है. यह पहल दिखाती है कि अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल सिर्फ सुदूर ग्रहों की खोज के लिए ही नहीं, बल्कि पृथ्वी की वास्तविक समस्याओं को सुलझाने के लिए भी हो रहा है.
NASA से आगे: ISRO और BRICS एजेंसियां कैसे बना रही हैं एक साझा सैटेलाइट नेटवर्क
अंतरिक्ष से जुड़ी चर्चाओं में आज भी नासा (NASA) का दबदबा रहता है, लेकिन सबसे काम का और व्यावहारिक अंतरिक्ष सहयोग अब शांत तरीके से, बहुराष्ट्रीय प्रणालियों के ज़रिये हो रहा है. ISRO और BRICS देशों की स्पेस एजेंसियों का यह नया सैटेलाइट नेटवर्क कोई एक अकेला विशालकाय स्पेसक्राफ्ट प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह एक साझा ‘रिमोट-सेंसिंग सैटेलाइट नेटवर्क’ है. इसका मकसद भारत और उसके सहयोगी देशों को पर्यावरण निगरानी, आपदा प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों के नियोजन (resource planning) में मदद करना है.
क्या है ISRO-BRICS वर्चुअल सैटेलाइट नेटवर्क?
यह BRICS स्पेस एजेंसियों के बीच रिमोट-सेंसिंग डेटा शेयरिंग का एक सहयोगी ढांचा है. इसे ‘वर्चुअल कांस्टेलेशन’ (Virtual Constellation) कहा जाता है. इसका मतलब यह है कि सदस्य देशों को नया सैटेलाइट बनाने और लॉन्च करने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा; वे अपने मौजूदा उपग्रहों और ग्राउंड स्टेशनों के डेटा को एक-दूसरे के साथ साझा करेंगे.
साधारण शब्दों में कहें तो, पारंपरिक सैटेलाइट नेटवर्क में सभी उपग्रहों को एक साथ डिजाइन और लॉन्च किया जाता है, जबकि वर्चुअल नेटवर्क में अलग-अलग देशों के सैटेलाइट्स को एक सिस्टम में जोड़कर इस्तेमाल किया जाता है. इससे कम लागत और कम समय में ज्यादा बड़ा दायरा कवर किया जा सकता है.
NASA की कहानी से कितना अलग है यह मॉडल?
नासा की ज्यादातर कहानियां अंतरिक्ष की खोज, नए ग्रहों पर पहुंचने और इंसानों को स्पेस में भेजने से जुड़ी होती हैं. लेकिन BRICS देशों का यह सहयोग पूरी तरह से ‘पृथ्वी केंद्रित’ (Earth-facing) है. इसका मकसद अंतरिक्ष से पृथ्वी की समस्याओं को देखना और उस डेटा का इस्तेमाल रोज़मर्रा के फैसलों में करना है.
भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम (ISRO) हमेशा से अपनी तकनीक को राष्ट्रीय विकास, मौसम पूर्वानुमान, संचार और नौवहन (navigation) से जोड़ता आया है. BRICS के इस कदम से ISRO की यह सोच अब वैश्विक मंच पर और मजबूत हो रही है.
हार्डवेयर से पहले नियमों और गवर्नेंस पर काम
BRICS रिमोट-सेंसिंग पहल की शुरुआत 2021 में डेटा शेयरिंग समझौते के साथ हुई थी. इसके बाद 2022 में BRICS जॉइंट कमेटी ने डेटा के आदान-प्रदान और ऑब्जर्वेशन की प्रक्रियाओं के नियम तय किए.
हाल ही में, जून 2026 में ISRO ने बेंगलुरु में BRICS स्पेस एजेंसियों के प्रमुखों की बैठक की मेजबानी की. इसमें रिमोट सेंसिंग, आपदा प्रबंधन, स्पेस सस्टेनेबिलिटी और नए सदस्य देशों को जोड़ने जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई. इससे साफ है कि BRICS एजेंसियां पहले नियम और कानूनी ढांचा (governance) बना रही हैं, ताकि आगे चलकर नए उपग्रहों और नए सदस्य देशों को आसानी से शामिल किया जा सके.
क्यों खास है यह वर्चुअल नेटवर्क?
कोई भी एक अकेला सैटेलाइट हर समय, हर जगह की तस्वीरें नहीं ले सकता. हर सैटेलाइट का सेंसर और ऑर्बिट (कक्षा) अलग होता है. जब कई सैटेलाइट्स को आपस में जोड़ा जाता है, तो किसी भी क्षेत्र की बेहतर और सटीक जानकारी मिलती है.
इसके प्रमुख व्यावहारिक फायदे इस प्रकार हैं:
आपदा राहत (Disaster Response): बाढ़, चक्रवात, भूस्खलन और जंगल की आग जैसी आपदाओं के समय त्वरित उपग्रह चित्र (satellite imagery) से नुकसान का आकलन और राहत कार्य आसान हो जाते हैं.
- पर्यावरण और जलवायु निगरानी: भूमि के उपयोग, जल संकट, जंगलों की कटाई और तटीय क्षरण (coastal erosion) का लगातार हिसाब रखा जा सकता है.
- कृषि और खाद्य सुरक्षा: मिट्टी की नमी और फसलों के स्वास्थ्य की निगरानी से किसानों को सही समय पर सलाह दी जा सकती है.
- क्षमता निर्माण: सदस्य देश एक-दूसरे की तकनीकों और डेटा मानकों से सीखकर अपनी क्षमताओं को बेहतर बनाते हैं.
इस साझेदारी में ISRO की भूमिका
ISRO के पास पृथ्वी की निगरानी (Earth Observation) का दशकों का अनुभव है. भारत के पास ज़मीन, जल, महासागर और वायुमंडल के नक्शे तैयार करने का बेहतरीन रिकॉर्ड रहा है.
इसलिए भारत इस समूह में सिर्फ डेटा लेने वाला देश नहीं है, बल्कि एक मजबूत तकनीकी भागीदार है. यह साझेदारी भारत की ‘स्पेस डिप्लोमेसी’ (अंतरिक्ष कूटनीति) का हिस्सा है, जहां तकनीक का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है.
चुनौतियां और आगे की राह
इस परियोजना के सामने कई तकनीकी और कूटनीतिक चुनौतियां भी हैं. विभिन्न देशों के सैटेलाइट्स के डेटा फॉर्मेट अलग होते हैं, जिन्हें एक समान बनाना पड़ता है. इसके अलावा डेटा की सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और गोपनीय जानकारी को सुरक्षित रखना भी बहुत ज़रूरी है.
फिर भी, ISRO और BRICS देशों की यह पहल दिखाती है कि स्पेस रेस का मतलब सिर्फ चांद या मंगल पर पहुंचना नहीं है. असली सफलता इस बात में भी है कि अंतरिक्ष की तकनीक से धरती पर रह रहे आम लोगों के जीवन को कितना सुरक्षित और बेहतर बनाया जा सकता है.
-भारत एक्सप्रेस
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