फोटो: 5 हजार साल से भी पहले जहां दुर्योधन-शकुनी ने पांडवों के लिए लाक्षागृह बनवाया था, वो जमीन बागपत जिले में है.
उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित बरनावा (प्राचीन वारणावत) का लाक्षागृह विवाद देश के सबसे पुराने कानूनी मामलों में से एक रहा है. यह वही ऐतिहासिक स्थान है जिसका संबंध द्वापर युग और महाभारत काल से है. इस स्थान को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्ष के बीच दशकों से कानूनी लड़ाई चल रही थी. कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों और पुरातात्विक साक्ष्यों के बाद अब इस स्थान को पूरी तरह से अतिक्रमण-मुक्त करने और इसके ऐतिहासिक स्वरूप को सहेजने की मांग तेज हो गई है.
बागपत का बरनावा विवाद और अदालती रूख
यह कानूनी विवाद साल 1970 में तब शुरू हुआ था, जब मुकीम खान नाम के एक स्थानीय व्यक्ति ने बागपत की अदालत में याचिका दायर की थी. मुस्लिम पक्ष का दावा था कि इस टीले पर सूफी संत बदरुद्दीन शाह की मजार और एक कब्रिस्तान मौजूद है, इसलिए यह वक्फ बोर्ड की संपत्ति है. वहीं, हिंदू पक्ष (कृष्ण बोध आश्रम के स्वामी कृष्णदत्त महाराज) का कहना था कि यह महाभारत कालीन लाक्षागृह का ऐतिहासिक टीला है, जहां प्राचीन काल से साधु-संत तपस्या करते आए हैं.
इस मामले में बागपत की सिविल कोर्ट का एक बेहद ऐतिहासिक और बड़ा फैसला सामने आया था. अदालत ने मुस्लिम पक्ष के सभी दावों को खारिज करते हुए इस पूरी 108 बीघे जमीन पर हिंदू पक्ष के अधिकार को सही माना. कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि बदरुद्दीन की मजार और कब्रिस्तान के दावे के पक्ष में मुस्लिम पक्ष कोई पुख्ता ऐतिहासिक या दस्तावेजी सबूत पेश नहीं कर सका.

2025-2026 में इस विवाद की कानूनी स्थिति
कानूनी विश्लेषण के अनुसार, निचली अदालत (सिविल कोर्ट) से हिंदू पक्ष के हक में फैसला आने के बाद मुस्लिम पक्ष ने इस निर्णय को ऊपरी अदालत में चुनौती दी थी. वर्तमान समय (2025-26) में यह मामला ऊपरी अदालत में विचाराधीन है और इसकी कानूनी समीक्षा की जा रही है. हालांकि, इस स्थान का नियंत्रण और देखरेख फिलहाल पुरातत्व विभाग (ASI) और स्थानीय हिंदू न्यास के पास है. एएसआई की खुदाई में यहां से कुषाण काल और महाभारत काल के समकालीन मिट्टी के बर्तन (Painted Grey Ware) और प्राचीन दीवारें मिली हैं, जो कोर्ट में हिंदू पक्ष का सबसे मजबूत आधार बनीं.

महाभारत: बरनावा का पौराणिक इतिहास
विश्व के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत ग्रंथ के अनुसार, द्वापर युग में पांडवों की बढ़ती लोकप्रियता और पराक्रम को देखकर दुर्योधन, शकुनि और धृतराष्ट्र के मन में ईर्ष्या की आग सुलग रही थी. युधिष्ठिर को युवराज बनाए जाने से घबराकर दुर्योधन ने उन्हें रास्ते से हटाने की एक खौफनाक योजना बनाई.
धृतराष्ट्र ने चतुराई से पांडवों को अपनी माता कुंती के साथ वारणावत के मेले में घूमने के लिए राजी कर लिया. पांडवों के वहां पहुंचने से पहले ही दुर्योधन ने अपने एक मंत्री ‘पुरोचन’ को वहां भेजकर एक सुंदर लेकिन बेहद खतरनाक महल का निर्माण करवाया. यह महल ईंट-पत्थरों का नहीं, बल्कि लाख, मोम, घी, चर्बी, सन और सूत जैसी अत्यंत ज्वलनशील चीजों को मिलाकर बनाया गया था. दुर्योधन की योजना थी कि पांडव जैसे ही रात को इस महल में सोएंगे, पुरोचन इसमें आग लगा देगा जिससे सभी पांडव जलकर मर जाएंगे और किसी को शक भी नहीं होगा.

विदुर की समझदारी और सुरंग का रहस्य
पांडवों के वारणावत प्रस्थान करने से पहले ही हस्तिनापुर के महामंत्री विदुर को दुर्योधन की इस साजिश की भनक लग गई थी. विदुर ने युधिष्ठिर को विदा करते समय एक गुप्त कूटनीतिक भाषा में एक गुप्त संदेश दिया. उन्होंने कहा, “जो व्यक्ति जंगल की आग से बचना चाहता है, वह चूहे की तरह जमीन के भीतर बिल (सुरंग) बना लेता है. आग कभी लोहे या पत्थर की बनी चीजों को नहीं खा सकती, लेकिन लाख का घर तुरंत स्वाहा हो जाता है.” युधिष्ठिर विदुर के इस गुप्त इशारे को समझ गए.
वारणावत पहुंचने पर पांडव उस लाक्षागृह में रहने लगे. युधिष्ठिर के निर्देश पर विदुर द्वारा भेजे गए एक वफादार और कुशल खनक (सुरंग खोदने वाले कारीगर) ने चुपके से महल के भीतर से लेकर गंगा नदी के किनारे तक निकलने वाली एक लंबी और सुरक्षित गुप्त सुरंग तैयार कर दी.
धू-धू कर जला लाक्षागृह, बच निकले पांडव
कई माह तक पांडव उस महल में रहे ताकि पुरोचन को उन पर कोई शक न हो. एक रात जब पुरोचन बेफिक्र होकर सो रहा था, तब भीमसेन ने महल के भंडार गृह और पुरोचन के कक्ष सहित लाक्षागृह के चारों कोनों में खुद ही आग लगा दी. देखते ही देखते पूरा लाक्षागृह धू-धू कर जल उठा. लपटें इतनी तेज थीं कि आस-पास के लोग चीखने लगे कि दुर्योधन की साजिश के कारण पांडव जल गए.
लेकिन, पुरोचन और कौरवों को भनक लगे बिना, भीमसेन अपनी माता कुंती और चारों भाइयों को लेकर उसी गुप्त सुरंग के रास्ते जमीन के नीचे से सुरक्षित बाहर निकल गए. सुरंग से बाहर निकलकर उन्होंने गंगा नदी पार की और घने जंगलों में चले गए, जहां उन्होंने भेष बदलकर ‘एकचक्रा नगरी’ में शरण ली. आज भी बागपत के बरनावा में उस प्राचीन सुरंग के अवशेष और लाक्षागृह का टीला मौजूद है, जो उस स्थान की गवाही देता है.
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

