भारत एक ऐसा देश है, जहां विविधता केवल भाषाओं और संस्कृतियों में ही नहीं, बल्कि त्योहारों के रूप और मान्यताओं में भी देखने को मिलती है. इन्ही में से एक है दिवाली, जिसे आमतौर पर हिंदू धर्म का सबसे प्रमुख त्योहार माना जाता है. लेकिन क्या आपको पता है कि ये न केवल हिंदू धर्म बल्कि बौद्ध, जैन और सिख धर्म में भी मनाया जाता है. आइए जानते की दिवाली को लेकर इन दूसरे धर्मों में क्या मान्यताएं हैं?
हिंदू धर्म की मान्यता
दिवाली हर वर्ष कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाता है. इसको लेकर हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है कि अमावस्या की रात को ही भगवान राम मां सीता व लक्ष्मण के संग अयोध्या वापस लौटे थे. उनके स्वागत में सभी अयोध्यावासियों ने पूरे नगर को दीपों से सजाया था, जिससे कार्तिक अमावस्या की वो रात रोशनी से जगमगा उठी थी. साथ ही इसी अमावस्या को माता लक्ष्मी समुद्र मंथन के दौरान सागर से प्रकट हुई थी, इसलिए इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा जाती है.
गौतम बुद्ध की वापसी का त्योहार
बौद्ध धर्म में दिवाली को लेकर वैसी ही मान्यता है जैसा कि हिंदू धर्म में है. जिस प्रकार भगवान श्री राम के घर वापसी पर पूरे राज्य ने दीपों से उनका स्वागत किया था, ठीक वैसे ही बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध 17 साल बाद अपने नगर कपिलवस्तु वापस लौटे थे। बुद्ध की वापसी पर पूरे नगर वासियों ने राज्य को लाखों दीपों से उनका स्वागत किया गया था। बौद्ध धर्म को मानने वाले सभी लोग दिवाली के दिन अपने घरों में दीए जलाकर गौतम बुद्ध को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं.
जैन मान्यता
अगर हम बात करें जैन धर्म की तो उनमें दिवाली एक महत्वपूर्ण त्योहार है. जैन धर्म में दिवाली को लेकर ये मान्यता है कि 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर को कार्तिक अमावस्या को मोक्ष मिला था. साथ ही इसी दिन उनके शिष्य गौतम गणधर को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. हालांकि जैन धर्म इस पर्व का उत्सव अलग ढंग से मनाता है, लेकिन हिंदू धर्म की ही तरह इसमें भी दीप जलाने की प्रथा है. इनमें दीप को ज्ञान और मोक्ष का प्रतीक माना जाता है.
स्वर्ण मंदिर से जुड़ी मान्यता
बौद्ध और जैन धर्म की तरह ही सिख समुदाय भी दिवाली के पर्व को खूब धूमधाम से मनाता है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन यानी कार्तिक मास की अमावस्या को वर्ष 1577 में स्वर्ण मंदिर की नींव रखी गई थी, जो सिख धर्म में तीर्थ स्थान के समान है. साथ ही इसी दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविंद सिंह को इसी दिन कैद से रिहाई मिली थी. इसलिए ये पर्व इनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है.
बेशक इन धर्मों में इस पर्व को लेकर अलग अलग मान्यता हो, लेकिन सभी इसे दीपोत्सव के रूप में मनाते है, जो विविधता होने के बावजूद सभी धर्मों को जोड़कर रखती है.
-भारत एक्सप्रेस
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