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कामदेव सिंह: बेगूसराय का रॉबिन हुड, जिसने कम्युनिस्टों के प्रभाव को दी थी चुनौती

बेगूसराय के ‘रॉबिन हुड’ कामदेव सिंह: ग्वाले से माफिया सरगना और ‘द ओरिजिनल गॉडफादर ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स’ बने. इन्होंने कम्युनिस्टों के प्रभाव को चुनौती दी, बूथ कैप्चरिंग का पर्याय बने.

Vijay Ram Edited by Vijay Ram

बिहार की राजनीति में बाहुबल हमेशा से एक महत्वपूर्ण कारक रहा है. दुर्भाग्य से यहां राजनीति और बाहूबल पूरक से हो गए. नब्बे के दशक तक राजनेता बाहुबलियों का सहयोग लेते थे, बाद में बाहुबली खुद ही नेता बनने लगे. इस बार के चुनाव में भी बाहुबली उम्मीदवार मैदान में हैं. ऐसे में बिहार के पहले बाहुबली माने गए एक शख्स की चर्चा जरूरी हो जाती है. इंडियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह की पुस्तक में कामदेव सिंह को द ओरिजिनल गॉडफादर ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स (The original Godfather of Indian Politics ) कहा गया.

जिन्हें बिहार के बेगूसराय जिले में “सम्राट” और “बिहार का पाब्लो एस्कोबार” के नाम से जाना जाता है, एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिनका नाम इतिहास, अपराध और राजनीति के पन्नों में अमिट रूप से दर्ज है. कामदेव सिंह ने अपने जीवन की शुरुआत एक साधारण ग्वाले के रूप में की, लेकिन जल्द ही वे बिहार के सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद माफिया सरगनाओं में से एक बन गए. उनके जीवन की कहानी साहस, शक्ति और रहस्यों से भरी है, जो उन्हें स्थानीय लोगों के लिए “रॉबिन हुड” और “देवता” से लेकर आलोचकों के लिए आतंक का पर्याय बनाती है.

अपराध की दुनिया में प्रवेश

बेगूसराय जिले के मटिहानी ब्लॉक के नया गांव में जन्मे कामदेव सिंह अल्पशिक्षित थे और अपने जीवन की शुरुआत एक ग्वाले के रूप में की. 1950 के दशक के अंत में उत्तरी बिहार में डकैती के साथ अपने अपराधी जीवन की शुरुआत की. 1960 के दशक तक बेगूसराय से लेकर उत्तर प्रदेश, नेपाल और कोलकाता व मुंबई जैसे महानगरों तक एक विशाल तस्करी नेटवर्क स्थापित कर लिया. उनके पास बंदूकधारियों, भाड़े के सैनिकों और तस्करों की एक “सेना” थी. 1979 तक 10,000 रुपये का पुलिस इनाम था.

राजनीतिक प्रभाव और बूथ कैप्चरिंग

1960 और 1970 के दशक में बेगूसराय को “पूर्व का लेनिनग्राद” कहा जाता था, जहां कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) का मजबूत प्रभाव था. कामदेव सिंह ने कम्युनिस्ट विरोधी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई और कई हिंसक झड़पों में शामिल रहे, जिनमें दर्जनों लोग मारे गए. स्थानीय लोगों के लिए वे एक रॉबिन हुड थे, जो कम्युनिस्टों के प्रभाव को चुनौती देते थे, जबकि आलोचक उन्हें राजनीति में आतंक का प्रतीक मानते थे.

कामदेव सिंह का राजनीतिक प्रभाव इतना था कि वे कांग्रेस और अन्य दलों के लिए बूथ कैप्चरिंग का एक भरोसेमंद साधन बन गए. 1969 के बिहार विधानसभा चुनाव में, उन्होंने मटिहानी में 34 मतदान केंद्रों पर कब्जा कर अपने संरक्षकों की जीत सुनिश्चित की. उनकी ताकत ऐसी थी कि वे अपने नौकरों को भी विधायक या सांसद बनवा सकते थे. कहा जाता है कि तस्करी नेटवर्क में नेपाल से कोलकाता तक ट्रक चलते थे, जिनके ड्राइवर हर मुख्य मार्ग पर बदल जाते थे और किसी को यह नहीं पता होता था कि ट्रक कहां से आया और कहां जाएगा. उनके गोदाम के गेटकीपर तक को पटना के सामंतवादी माना जाता था.

रहस्यमयी अंत

कामदेव सिंह का अंत उतना ही नाटकीय और रहस्यमयी था जितना उनका जीवन. 15 मई 1980 को, बिहार पुलिस और CRPF की संयुक्त टीम ने नया गांव में एक गुप्त रात के ऑपरेशन में उन्हें घेर लिया. बताया जाता है कि सिंह गंगा नदी की ओर भागे, लेकिन मुठभेड़ में उनकी मृत्यु हो गई. उनका शव अगली सुबह नदी के किनारे मिला, जिसमें गोली के घाव और गिरने की चोटें थीं. उनके बेटे राजकुमार सिंह ने बाद में दावा किया कि यह एक सुनियोजित हत्या थी. यह सवाल आज भी अनुत्तरित है कि आखिर ऐसी क्या परिस्थितियां थीं कि कांग्रेस के कट्टर समर्थक के खून के प्यासे केंद्र और राज्य सरकार के शीर्ष नेता हो गए. क्या यह किसी केंद्रीय गृह मंत्री की इज्जत की लड़ाई थी या किसी पुलिस अधिकारी की साजिश?

विरासत

कामदेव सिंह अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ जीवित रहे. उनके बड़े बेटे, राजकुमार सिंह, ने 2020 में मटिहानी विधानसभा क्षेत्र से लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के उम्मीदवार के रूप में अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया. स्थानीय लोग कामदेव सिंह को दोहरे रूप में याद करते हैं—कुछ के लिए वे गरीबों के मसीहा थे, तो कुछ के लिए आतंक का पर्याय.

उनकी कहानी को संतोष सिंह की पुस्तक कामदेव सिंह: द ओरिजिनल गॉडफादर ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स (2022) और कई वृत्तचित्रों में चित्रित किया गया है.

कामदेव सिंह की कहानी बेगूसराय की धरती पर एक जीवट कथा के रूप में गूंजती है. वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सत्ता, अपराध, और समाज के बीच की महीन रेखा को पार किया.



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