Bharat Express DD Free Dish
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital
Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital

बिना एंटीडोट वाला केमिकल: जिस ‘जहर’ को दुनिया के 74 देश बैन कर चुके, उसे भारत के खेतों में क्‍यों उड़ेला जा रहा?

Toxic Pesticides India: दुनिया के 74 देशों में प्रतिबंधित और बिना किसी एंटीडोट वाला जानलेवा केमिकल ‘पैराक्वाट डाइक्लोराइड’ भारत के खेतों में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. समझिए ये कितना नुकसानदेह है, और मूंग-धान जैसी फसलें किस तरह जहरीली हुई जा रही हैं.

बिना एंटीडोट वाला खतरनाक केमिकल

फोटो: खेतों में छिड़का जा रहा बिना इलाज वाला जहर

Banned Agriculture Chemicals: एक ऐसा रासायनिक केमिकल, जिसकी महज कुछ बूंदें भी अगर इंसान के शरीर में चली जाएं तो उसकी मौत निश्चित है. सबसे खौफनाक बात यह है कि चिकित्सा विज्ञान में आज तक इस जहर का कोई निश्चित इलाज या एंटीडोट (काट) ही नहीं बना है. इसके बावजूद, यह जानलेवा केमिकल ‘पैराक्वाट डाइक्लोराइड’ (Paraquat Dichloride) भारत के खेतों में खुलेआम और धड़ल्ले से छिड़का जा रहा है. इस केमिकल की अत्यधिक विषाक्तता और मानव जीवन के लिए इसके जानलेवा खतरों को देखते हुए दुनिया के 74 विकसित और विकासशील देश इस पर बहुत पहले पूरी तरह प्रतिबंध (बैन) लगा चुके हैं. लेकिन हमारे देश की ढीली नियामक व्यवस्था का फायदा उठाकर कीटनाशक कंपनियां इसे धड़ल्ले से बेच रही हैं, जिससे नागरिकों की सेहत के साथ बड़ा खिलवाड़ हो रहा है.

कपड़ा रंगने वाली डाई से बना खरपतवारनाशक

पैराक्वाट डाइक्लोराइड का इतिहास बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला है. इसे पहली बार साल 1882 में दो ऑस्ट्रियाई वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में तैयार किया था. शुरुआती दौर में इसे ‘मिथाइल वायलोन’ नाम दिया गया था और इसका उपयोग केवल कपड़ों को रंगने के लिए एक रासायनिक डाई के रूप में किया जाता था. इसके दशकों बाद, साल 1955 में यूनाइटेड किंगडम (UK) की ‘इम्पीरियल केमिकल इंडस्ट्रीज’ (ICI) के ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने इसके खरपतवारनाशक गुणों की खोज की. उन्होंने पाया कि यह पौधों को बेहद तेजी से सुखाकर नष्ट कर देता है. इसके बाद साल 1961 में यूके में इसका औद्योगिक उत्पादन शुरू हुआ और 1962 में इसे ‘ग्रामोक्सोन’ ब्रांड नाम से दुनिया के बाजारों में व्यावसायिक तौर पर उतारा गया.

भारत में ‘अनुपम वर्मा कमेटी’ की कानूनी ढाल

भारत में हरित क्रांति के दौरान जब मैन्युअल लेबर (निराई-गुड़ाई) का खर्च कम करने और कृषि उत्पादन बढ़ाने का दबाव था, तब इस केमिकल को भारतीय बाजार में प्रवेश मिला. भारत में कीटनाशकों को मंजूरी देने वाली संस्था ‘सेंट्रल इंसेक्टिसाइड बोर्ड एंड रजिस्ट्रेशन कमेटी’ (CIBRC) ने इसे केवल 9 फसलों (चाय, आलू, कपास, रबर, कॉफी, धान, गेहूं, मक्का और अंगूर) में सीमित इस्तेमाल के लिए पंजीकृत किया था.

वैश्विक स्तर पर बढ़ते विरोध के बीच कृषि मंत्रालय ने 8 जुलाई 2013 को दुनिया भर में प्रतिबंधित लेकिन भारत में चल रहे 66 कीटनाशकों की समीक्षा के लिए ‘डॉ. अनुपम वर्मा कमेटी’ का गठन किया. इस कमेटी ने साल 2015 में सुरक्षित पैकेजिंग और डॉक्टरों की ट्रेनिंग जैसी कागजी शर्तों के भरोसे पैराक्वाट डाइक्लोराइड को भारत में हरी झंडी दे दी. कमेटी की यही सिफारिश आज इस जानलेवा जहर के लिए एक मजबूत ‘कानूनी ढाल’ बनी हुई है.

Side effects of spraying pesticides i

फूड चेन में शामिल हो रहा यह जहर

मौजूदा समय में भारत में हर साल 100 मीट्रिक टन से अधिक पैराक्वाट डाइक्लोराइड का छिड़काव हमारी फसलों पर किया जा रहा है. बिना किसी सुरक्षा गियर (मास्क या ग्लव्स) के खेतों में इसका छिड़काव कर रहे मासूम किसानों को यह अंदाजा भी नहीं है कि वे कितने बड़े खतरे के बीच काम कर रहे हैं. व्यवस्था की इस खुली लापरवाही का सबसे भयानक रूप राजस्थान और मध्य प्रदेश के खेतों में देखने को मिल रहा है. वहां लेबर का खर्च और समय बचाने के लिए खड़ी मूंग की फसल को जबरन और तेजी से सुखाने के लिए पैराक्वाट का अंधाधुंध छिड़काव किया जा रहा है. महज दो दिनों में जबरन सुखाकर काटी गई यह मूंग सीधे तौर पर हमारी फूड चेन (खाद्य श्रृंखला) का हिस्सा बन रही है, जिससे इस जानलेवा जहर का अंश सीधे उपभोक्ताओं की रसोई और पेट तक पहुंच रहा है.

देशव्यापी प्रतिबंध की उठ रही मांग

पर्यावरणविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जब इस केमिकल को बनाने वाले देश (UK) सहित दुनिया के 74 देशों ने अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए इसे कचरे के डिब्बे में फेंक दिया है, तो भारत में ब्यूरोक्रेट्स और नीति-निर्माता इस पर मौन क्यों साधे हुए हैं? इस जहर के कारण हर साल सैकड़ों किसानों के फेफड़े, किडनी और लीवर खराब होने की शिकायतें सामने आती हैं. देश की मिट्टी और इंसानी स्वास्थ्य को बचाने के लिए अब वैज्ञानिक स्तर पर इस बात की पुरजोर मांग उठ रही है कि सरकार को अनुपम वर्मा कमेटी के पुराने फैसले की समीक्षा करते हुए पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर देशव्यापी पूर्ण प्रतिबंध तुरंत लागू करना चाहिए.

यह भी पढ़िए: भारत के सबसे बड़े नदी तंत्र पर संकट के बादल, गंगा रिवर बेसिन में 1300 साल का सबसे भयानक सूखा- आगे क्या होगा?



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital