Bharat Express DD Free Dish
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital

जिसके साथ ब्राह्मण, उसी की सरकार! यूपी फतह करने के लिए अखिलेश यादव ने बदला अपना चुनावी फॉर्मूला

Akhilesh Yadav On Brahmin: अखिलेश यादव ने PDA की नई व्याख्या भी की. उन्होंने कहा कि PDA में ‘पीडी’ का मतलब पंडित भी है. उनका कहना था कि जिन लोगों को जितनी पीड़ा दी जाएगी, PDA उतना ही मजबूत होगा. सपा प्रमुख ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उसकी राजनीति केवल पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक तक सीमित नहीं है.

Akhilesh Yadav On Brahmin

Akhilesh Yadav On Brahmin

Akhilesh Yadav On Brahmin: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है. समाजवादी पार्टी अब अपने पुराने वोट बैंक से आगे बढ़कर ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश में जुटी दिख रही है. लखनऊ में जनेश्वर मिश्र की जयंती पर हुए प्रबुद्ध सम्मेलन में इसका संकेत भी देखने को मिला.

सम्मेलन में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने त्रिशूल उठाया. डमरू बजा और शिव तांडव स्तोत्र का पाठ भी हुआ. मंच पर पवन पांडेय, सनातन पांडेय, माता प्रसाद पांडेय, अभिषेक मिश्रा और करुणेश द्विवेदी जैसे कई ब्राह्मण नेता मौजूद थे.

इस पूरे आयोजन के जरिए सपा ने यह संदेश देने की कोशिश की कि उसकी राजनीति केवल पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक तक सीमित नहीं है.

PDA में ‘पंडित’ की एंट्री

अखिलेश यादव ने PDA की नई व्याख्या भी की. उन्होंने कहा कि PDA में ‘पीडी’ का मतलब पंडित भी है. उनका कहना था कि जिन लोगों को जितनी पीड़ा दी जाएगी, PDA उतना ही मजबूत होगा.

अब तक सपा PDA को पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के रूप में पेश करती रही है. लेकिन अखिलेश के इस बयान के बाद माना जा रहा है कि पार्टी ब्राह्मण समाज को भी इस फॉर्मूले में जोड़ना चाहती है. पर सवाल यह है कि क्या सपा भाजपा के मजबूत ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगा पाएगी?

यूपी की करीब 100 सीटों पर प्रभाव

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता कई विधानसभा सीटों पर हार-जीत तय करने की स्थिति में माने जाते हैं. अलग-अलग आकलनों के अनुसार करीब 100 सीटों पर उनका सीधा या बड़ा प्रभाव है.

एक समय ब्राह्मण समाज कांग्रेस का सबसे भरोसेमंद वोट बैंक हुआ करता था. उत्तर प्रदेश में अब तक छह ब्राह्मण मुख्यमंत्री हुए और सभी कांग्रेस से थे. ब्राह्मण नेताओं ने करीब 23 साल तक प्रदेश की सत्ता संभाली. कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी उत्तर प्रदेश के आखिरी ब्राह्मण मुख्यमंत्री थे.

राम मंदिर आंदोलन के बाद राजनीतिक तस्वीर बदल गई. ब्राह्मण मतदाता धीरे-धीरे भाजपा की ओर चले गए. हालांकि बीच-बीच में इस वोट बैंक ने दूसरे दलों का भी साथ दिया.

2007 में मायावती को मिला था बड़ा फायदा

साल 2007 में बहुजन समाज पार्टी ने ब्राह्मण-दलित गठजोड़ बनाया था. उस चुनाव में बसपा के 41 ब्राह्मण उम्मीदवार विधायक बने और मायावती ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई.

साल 2012 में समाजवादी पार्टी के 21 ब्राह्मण विधायक जीते और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने. इसके बाद 2017 में भाजपा के 58 ब्राह्मण विधायक चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे. 2022 में भी भाजपा के 41 ब्राह्मण विधायक जीते.

इन आंकड़ों से एक बात साफ दिखाई देती है. पिछले कई चुनावों में जिस दल के पास ज्यादा ब्राह्मण विधायक रहे, सत्ता भी उसी के हाथ लगी.

अखिलेश ने याद दिलाई कृष्ण-सुदामा की दोस्ती

ब्राह्मण समाज को जोड़ने की कोशिश में अखिलेश यादव ने भगवान कृष्ण और सुदामा की दोस्ती का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि दुनिया में कृष्ण और सुदामा जैसी दोस्ती का दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है.

अखिलेश ने दावा किया कि समाजवादी पार्टी को जब भी मौका मिला, उसने सभी वर्गों को सम्मान देने का काम किया. उनके इस बयान को यादव और ब्राह्मण समाज के बीच राजनीतिक रिश्ते मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

भाजपा ने किया पलटवार

सपा की इस रणनीति पर भाजपा ने तीखा हमला बोला है. उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने कहा कि समाजवादी पार्टी अब ब्राह्मणों का भरोसा जीतने की कोशिश कर रही है, लेकिन जनता उसके पुराने शासन को नहीं भूली है.

ये भी पढ़ें- ‘आज़ाद भारत में गुलामी के प्रतीक स्‍वीकार्य नहीं..’, संसद में डॉ. दिनेश शर्मा ने की बाबर-अकबर रोड के नाम बदलने की मांग

उन्होंने सपा पर अपने शासनकाल में गुंडागर्दी, अराजकता और दंगों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया. पाठक ने यह भी कहा कि सनातन और ब्राह्मण समाज को लेकर सपा का नया रुख केवल चुनावी दिखावा है.

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Kanya Sumangla Mission Shakti Digital