इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
Allahabad High Court Judgement: अगर कोई बच्चा नाजायज है, तो क्या उसका खुद का जैविक पिता उसे कानूनी रूप से गोद ले सकता है? समाज और कानूनी गलियारों में अक्सर उठने वाले इस पेचीदा सवाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद ऐतिहासिक और स्पष्ट फैसला सुनाया है. जस्टिस अरुण कुमार की बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956’ के तहत किसी हिंदू पुरुष को अपने ही नाजायज बेटे को गोद लेने से सिर्फ इसलिए नहीं रोका जा सकता, क्योंकि वह उसका जैविक पिता है.
क्या था पूरा मामला और 54 साल पुराना विवाद? (Allahabad High Court Adoption Case)
यह पूरा विवाद साल 1970 से जुड़ा है, जो ‘बडलू’ नाम के व्यक्ति की कृषि भूमि की विरासत को लेकर था.
वादी (राम केश) का कहना था कि उसकी मां की शादी भले ही बुध राम से हुई थी, लेकिन उसका असली जैविक पिता बडलू ही है. बडलू ने 8 नवंबर 1970 को उसे कानूनी तौर पर गोद ले लिया था. वादी ने 1973 में बडलू द्वारा प्रतिवादियों के पक्ष में की गई ‘बिक्री डीड’ को धोखाधड़ी बताते हुए चुनौती दी थी. दूसरी तरफ, प्रतिवादियों का तर्क था कि चूंकि वादी खुद बडलू का ‘जैविक (सगा) बेटा’ है, इसलिए कानूनी रूप से बडलू उसे गोद ले ही नहीं सकता.
‘नाजायज होना गोद लेने में कोई अयोग्यता नहीं’
हाईकोर्ट ने इस मामले में निचली अदालतों के फैसले को सही ठहराते हुए 1956 के अधिनियम की धारा 10 का हवाला दिया. कोर्ट ने कहा, “कानूनी अयोग्यता की लिस्ट में नाजायज़ होने का ज़िक्र कहीं नहीं है. इस एक्ट में ऐसा कोई भी नियम नहीं है जो किसी हिंदू पुरुष को अपने ही नाजायज़ बेटे को गोद लेने से रोकता हो.”
अदालत ने यह भी साफ किया कि बच्चे को ‘देने और लेने’ की क्रिया ही गोद लेने का मुख्य हिस्सा है. भले ही गोद लेने वाला व्यक्ति सगा पिता हो, इससे गोद लेने की रस्म कानूनी रूप से बेकार नहीं हो जाती.
धोखाधड़ी से की गई डीड रद्द (Allahabad High Court Latest News)
इसके अलावा, कोर्ट ने प्रतिवादियों द्वारा लिखवाई गई ज़मीन की ‘बिक्री डीड’ के मामले में भी सख्त रुख अपनाया. हाईकोर्ट ने निचली अदालत के निष्कर्ष को बरकरार रखते हुए कहा कि सिर्फ किसी दस्तावेज़ के ‘रजिस्टर्ड’ होने का मतलब यह नहीं है कि उसे चुनौती नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने सबूतों के आधार पर माना कि वह ज़मीन का लेन-देन धोखाधड़ी वाला था. इस तरह, अदालत ने प्रतिवादियों की दूसरी अपील को खारिज कर दिया और नाजायज़ बेटे के गोद लिए जाने की वैधता को कायम रखा.
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