जहाँ एक तरफ प्रयागराज नगर निगम डबल एंट्री कर उपभोक्ताओं का आरसी के नाम पेट भारी शोषण कर रही है तो वही दूसरी तरफ नगर निगम में आउटसोर्सिंग पे काम कर रहे कर्मचारियो द्वारा 1.44 करोड़ रुपये के गबन का मामला उजागर हुआ. यह घोटाला न केवल निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि आउटसोर्सिंग व्यवस्था की पारदर्शिता और निगरानी तंत्र की पोल भी खोलता है.
सूत्रो की माने तो नगर निगम के जोन-3 और जोन-7 में कार्यरत दो आउटसोर्स कंप्यूटर ऑपरेटर – आकाश श्रीवास्तव (जोन-3) और सत्यम शुक्ला (जोन-7) – पर आरोप है कि इन्होंने गृहकर के नाम पर जनता से धनराशि वसूली, रसीदें काटीं, लेकिन वह राशि निगम के खजाने तक पहुंची ही नहीं. इस गबन को लेकर मुख्य कर निर्धारण अधिकारी पी.के. द्विवेदी द्वारा दी गई तहरीर के मुताबिक प्रारंभिक जांच में पाया गया कि जोन 3 के आकाश श्रीवास्तव की आईडी से काटी गई 88 रसीदों में ₹18,08,661 की राशि निगम कोष में नहीं जमा की गई. वहीं जोन 7 के सत्यम शुक्ला की आईडी से 387 गृहकर रसीदें जारी की गईं, जिनकी राशि ₹1,26,05,368 थी जो गायब है.
निगम प्रशासन की भूमिका
यही नहीं जोन 7 के सत्यम शुक्ला ने अपने फर्जीवाड़े को छिपाने के लिए 30 मार्च को आईटी ऑफिसर केशव गुप्ता से संपर्क कर अपनी आईडी निष्क्रिय करवा दी. साथ ही उसने 29 मार्च की 14 रसीदें भी निरस्त करवा लीं, ताकि रिकार्ड में गड़बड़ी छिपाई जा सके.
नगर निगम के मुख्य नगर लेखा परीक्षक द्वारा कराए गए विशेष ऑडिट से दोनों ऑपरेटरों की गतिविधियों की परतें खुलीं. ऑडिट आख्या में यह साफ-साफ दर्शाया गया है कि यह सोची-समझी वित्तीय अनियमितता है. इसके आधार पर कर्नलगंज थाने में एफआईआर दर्ज कर ली गई है, और दोनों आरोपियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू हो गई है.
अब सवाल यह उठ रहा है कि इतनी बड़ी धनराशि का गबन सिर्फ दो कंप्यूटर ऑपरेटरों की करतूत हो सकती है या फिर इसके पीछे कोई बड़ी सांठगांठ है? क्या संबंधित जोन के प्रभारी, लेखा अधिकारी या अन्य स्टाफ को इसकी भनक नहीं लगी? या वे भी इस घोटाले में मौन समर्थन कर रहे थे?
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-भारत एक्सप्रेस
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