सपा के पोस्टर पर BJP को लगी मिर्ची
SP BJP Poster War: उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन सियासी दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है. अयोध्या में राम मंदिर के बाद अब लखनऊ की सड़कों पर भगवान कृष्ण के नाम पर सियासी जंग छिड़ गई है. समाजवादी पार्टी के दफ्तर के बाहर लगे एक पोस्टर ने राजधानी में पोस्टर वॉर शुरू कर दिया. सपा के पोस्टर पर लिखा है, ’27 में कृष्ण आएंगे’. इसके जवाब में बीजेपी कार्यालय के बाहर पोस्टर लगा, ‘जो राम को लाए हैं, 27 में कृष्ण को लाएंगे’.
अब सवाल सिर्फ दो पोस्टरों का नहीं है. सवाल यह है कि क्या अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी बीजेपी के धार्मिक प्रतीकों वाले राजनीतिक दांव का जवाब उसी अंदाज में देने की कोशिश कर रही है? क्या राम मंदिर के बाद मथुरा का मुद्दा यूपी चुनाव की नई धुरी बनने जा रहा है? और सबसे बड़ा सवाल, क्या 2027 के चुनाव में कृष्ण के नाम पर वोटों का नया समीकरण तैयार होगा?
सियासी मैदान में कृष्ण की एंट्री
यूपी की राजनीति में धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है. अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा लंबे समय तक प्रदेश की राजनीति के केंद्र में रहा. अब विधानसभा चुनाव से पहले भगवान कृष्ण के नाम पर नई सियासी बहस शुरू हो गई है.
धर्म के नाम पर बयानबाज़ी, अब पोस्टर से जवाब
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— Article19 India (@Article19_India) November 5, 2026
इसकी शुरुआत लखनऊ में समाजवादी पार्टी के मुख्यालय के बाहर लगे एक पोस्टर से हुई. पोस्टर पर लिखा था, ’27 में कृष्ण आएंगे’. इस एक लाइन ने प्रदेश की सियासत में नई चर्चा छेड़ दी. बीजेपी ने भी देर नहीं की और अपने कार्यालय के बाहर जवाबी पोस्टर लगा दिया. इस पर लिखा था, ‘जो राम को लाए हैं, 27 में कृष्ण को लाएंगे’.
देखते ही देखते यह पोस्टर वॉर राजनीतिक बयानबाजी में बदल गया. बीजेपी और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने एक-दूसरे पर धार्मिक आस्था और मंदिरों के मुद्दे को लेकर हमले शुरू कर दिए.
कृष्ण को मानते हैं तो मथुरा के लिए क्यों नहीं उठाते आवाज?
इस पूरे विवाद में यूपी सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने भी समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा. उन्होंने सवाल उठाया कि अखिलेश यादव न तो मथुरा जाते हैं और न ही भगवान कृष्ण के दर्शन करते हैं.
राजभर ने कहा कि समाजवादी पार्टी के पोस्टर में कोई दम नहीं है. उन्होंने आगे कहा कि बीजेपी के नेता मंदिर बनवाने और भगवान के दर्शन करने जाते हैं, जबकि समाजवादी पार्टी के नेता ऐसा नहीं करते.
बीजेपी के प्रवक्ता रत्नाकर सिंह ने भी इसी मुद्दे पर समाजवादी पार्टी को घेरा. उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी अगर खुद को भगवान कृष्ण का अनुयायी मानती है तो उसे मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि के मुक्ति अभियान में आगे आना चाहिए.
रत्नाकर सिंह ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी इस मुद्दे पर कोई अभियान नहीं चलाती, बल्कि मस्जिदों में जाकर बैठकें करती है. पार्टी की कथनी और करनी में बड़ा अंतर है.
कारसेवकों की गोलीबारी का मुद्दा उठाया
बीजेपी प्रवक्ता ने इस दौरान राम मंदिर आंदोलन का जिक्र कर निशाना साधा. उन्होंने आरोप लगाया कि जिस पार्टी के शासनकाल में राम मंदिर आंदोलन से जुड़े कारसेवकों पर गोली चलवाई गई, वही पार्टी अब कृष्ण के नाम पर राजनीति कर रही है.
उन्होंने मुलायम सिंह यादव के पुराने बयानों और रामगोपाल यादव के सदन में दिए गए बयान का हवाला देते हुए समाजवादी पार्टी पर सवाल उठाए.
बीजेपी का आरोप है कि समाजवादी पार्टी धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल केवल चुनावी फायदे के लिए करती है. पार्टी का कहना है कि अगर अखिलेश यादव वास्तव में भगवान कृष्ण के प्रति आस्था रखते हैं तो उन्हें मथुरा के मुद्दे पर भी खुलकर सामने आना चाहिए.
सपा ने पोस्टर से कर लिया किनारा
बीजेपी के आरोपों पर समाजवादी पार्टी की प्रवक्ता डॉ. पूजा मिश्रा ने जवाब दिया. उन्होंने साफ किया कि ’27 में कृष्ण आएंगे’ वाला पोस्टर समाजवादी पार्टी की ओर से आधिकारिक तौर पर नहीं लगाया गया है.
उन्होंने कहा कि किसी कार्यकर्ता ने अपनी इच्छा से पोस्टर लगाया होगा. पार्टी को इसमें ऐसा कुछ गलत नहीं लगा, जिससे किसी समाज या वर्ग के खिलाफ विवाद पैदा हो. इसलिए इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई.
पूजा मिश्रा ने बीजेपी पर पलटवार करते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी बीजेपी के पदचिह्नों पर नहीं चल सकती. उन्होंने राम मंदिर के निर्माण के दौरान चोरी और उससे जुड़े विवादों का भी जिक्र किया.
शंकराचार्य के मुद्दे पर भी उन्होंने बीजेपी के आरोपों को खारिज किया. उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी ने शंकराचार्य पर लाठीचार्ज नहीं कराया था, बल्कि उस समय उनके साथ दुर्व्यवहार हुआ था.
मुस्लिम वोट बैंक और मंदिर जाने पर उठे सवाल
भारत एक्सप्रेस से बातचीत में राजनीतिक विश्लेषक संजय राणा ने इस पोस्टर को लेकर समाजवादी पार्टी पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि भगवान राम और कृष्ण पूरे देश की आस्था के प्रतीक हैं. समाजवादी पार्टी के नेताओं को मंदिर जाने से परहेज नहीं करना चाहिए.
उन्होंने आरोप लगाया कि अखिलेश यादव मुस्लिम वोट बैंक के खिसकने के डर से मंदिरों से दूरी बनाते हैं. राणा ने कहा कि समाजवादी पार्टी की राजनीति एमवाई यानी मुस्लिम-यादव समीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही है.
इस पर सपा प्रवक्ता पूजा मिश्रा ने जवाब दिया कि बीजेपी खुद भी धार्मिक मुद्दों को राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाती है. उन्होंने कहा कि किसी को भी अपनी आस्था और धार्मिक पहचान के आधार पर दूसरे पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं है.
सियासी हवा ने बदल ली करवट
यूपी में 2027 का रण अभी दूर है, लेकिन सियासी हवा ने अभी से करवट बदल ली है. लखनऊ की दीवारों पर चिपके एक पोस्टर ने बता दिया है कि इस बार का मुकाबला सिर्फ विकास और जातीय समीकरणों पर नहीं, बल्कि धार्मिक प्रतीकों पर भी लड़ा जाएगा.
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एक तरफ बीजेपी राम मंदिर और मथुरा के मुद्दे पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है, तो दूसरी तरफ सपा भगवान कृष्ण के नाम वाले पोस्टर की वजह से खुद ही घिर गई है. राम के बाद अब कृष्ण के नाम पर सियासत गरमा गई है. आने वाले दिनों में यह बहस यूपी की राजनीति को किस मोड़ पर ले जाएगी, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि चुनाव से पहले धर्म और आस्था ही सबसे बड़ा मुद्दा बनने वाला है.
-भारत एक्सप्रेस
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