देश को आजाद हुए अभी सिर्फ दो दिन हुए थे. लोग आजादी की खुशी से पूरी तरह उबर भी नहीं पाए थे कि एक ऐसी खबर सामने आई, जिसने लाखों लोगों की जिंदगी का रास्ता हमेशा के लिए बदल दिया. इसी दिन भारत सरकार के गजट में बंगाल और पंजाब सीमा आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक की गई. सर सिरिल रैडक्लिफ की बनाई सीमा रेखा अब लोगों के सामने थी. बाद में यही रेखा ‘रैडक्लिफ लाइन’ के नाम से जानी गई.
नक्शे पर खींची गई यह रेखा देखने में भले कुछ इंच की स्याही भर थी, लेकिन जमीन पर रहने वाले लोगों के लिए इसका मतलब बेहद बड़ा था. किसी को पता चला कि उसका गांव अब भारत में नहीं, पाकिस्तान में है. किसी की खेती सीमा के दूसरी तरफ चली गई तो किसी का घर ही नए देश का हिस्सा बन गया. जिन परिवारों और समुदायों ने पीढ़ियों से साथ रहकर जिंदगी बिताई थी, वे अचानक अलग-अलग देशों के नागरिक बन गए.
यही वजह है कि 17 अगस्त को सिर्फ एक प्रशासनिक घोषणा के तौर पर देखना इस घटना की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता. यह वह दिन भी था, जब विभाजन की मानवीय त्रासदी ने और स्पष्ट रूप लेना शुरू किया.
विभाजन को समझने की कोशिश
विभाजन के पीछे कौन-सी राजनीतिक परिस्थितियां थीं, अंग्रेजों की नीतियों ने इसमें क्या भूमिका निभाई और भारतीय राजनीति के कौन-से फैसले इस मुकाम तक लेकर आए. इन सवालों को समझने के लिए प्रियंवद की किताब भारत विभाजन की अंतःकथा महत्वपूर्ण मानी जाती है.
लेखक ने इतिहास को केवल 1947 तक सीमित नहीं रखा है. करीब 240 वर्षों की घटनाओं और बदलावों के जरिए वे उन राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समझने की कोशिश करते हैं, जिनका असर आखिरकार देश के बंटवारे पर पड़ा. किताब दस्तावेजों, तथ्यों और ऐतिहासिक विश्लेषण के सहारे विभाजन की पृष्ठभूमि को सामने रखती है.
लेकिन इतिहास हमें यह बताता है कि विभाजन हुआ कैसे. साहित्य हमें यह महसूस कराता है कि उस दौर में आम इंसान पर क्या बीती.
यशपाल का ‘झूठा सच’
विभाजन पर हिंदी साहित्य की चर्चा हो और यशपाल के झूठा सच का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं. 1958 से 1960 के बीच प्रकाशित यह दो खंडों वाली रचना—वतन और देश और देश का भविष्य—विभाजन की व्यापक तस्वीर पेश करती है.
यशपाल सिर्फ दंगों और पलायन की घटनाएं नहीं गिनाते. वे यह दिखाते हैं कि राजनीति, सांप्रदायिक तनाव और सत्ता की महत्वाकांक्षा जब आम जिंदगी में घुसती है तो उसका असर कितना विनाशकारी हो सकता है. लोगों के घर, रिश्ते, रोजगार और भविष्य—सब कुछ अचानक अनिश्चित हो जाता है.
‘तमस’: अफवाह से हिंसा तक
भीष्म साहनी का तमस विभाजन की भयावहता को बेहद करीब से दिखाता है. रावलपिंडी में जन्मे साहनी ने विभाजन का दौर खुद देखा था. उपन्यास में एक छोटी-सी घटना कैसे पूरे इलाके को सांप्रदायिक हिंसा की आग में झोंक देती है, यही इसकी बड़ी ताकत है.
अफवाह, डर और असुरक्षा धीरे-धीरे लोगों के व्यवहार को बदल देते हैं. जो पड़ोसी कल तक एक-दूसरे के साथ खड़े थे, वे ही शक और नफरत के कारण आमने-सामने आ जाते हैं. बाद में गोविंद निहलानी ने तमस को दूरदर्शन के लिए धारावाहिक के रूप में रूपांतरित किया, जिसने विभाजन की भयावहता को देश के घर-घर तक पहुंचाया.
राही मासूम रज़ा का आधा गाँव गाजीपुर के एक मुस्लिम गांव के जरिए विभाजन की कहानी कहता है. यहां सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सीमा किस तरफ गई.
भाषा, संस्कृति, रिश्ते और स्थानीय परंपराएं किसी नक्शे की रेखा से अचानक खत्म नहीं होतीं. रज़ा इसी उलझन को सामने लाते हैं कि जब राजनीति लोगों को अलग-अलग खानों में बांटती है तो सदियों से बनी सामाजिक पहचान पर उसका क्या असर पड़ता है.
‘कितने पाकिस्तान’ का बड़ा सवाल
कमलेश्वर ने कितने पाकिस्तान में विभाजन को सिर्फ 1947 की घटना के रूप में नहीं देखा. उनकी रचना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है—आखिर पाकिस्तान कितने हैं? क्या बंटवारा सिर्फ जमीन का होता है, या इंसान के मन में भी सीमाएं खिंच जाती हैं?
यह किताब इतिहास, राजनीति और इंसानी सोच के उन हिस्सों को टटोलती है, जहां धर्म, सत्ता और पहचान के नाम पर समाज बार-बार विभाजित होता रहा है.
महिलाओं की पीड़ा: ‘पिंजर’
विभाजन की कहानी का एक बेहद दर्दनाक अध्याय महिलाओं से जुड़ा है. अमृता प्रीतम का पिंजर इसी पीड़ा को केंद्र में रखता है.
पूरो की कहानी बताती है कि दंगों और पलायन के बीच महिलाओं के शरीर और उनकी ‘इज्जत’ को किस तरह सामुदायिक बदले का मैदान बना दिया गया. अपहरण, हिंसा और जबरन अलगाव ने हजारों महिलाओं की जिंदगी बर्बाद कर दी. पिंजर इस दर्द को किसी आंकड़े की तरह नहीं, बल्कि एक इंसान की जिंदगी के रूप में सामने रखता है.
उर्दू के महान कहानीकार सआदत हसन मंटो ने विभाजन को उसकी सबसे कड़वी और असहज सच्चाई के साथ लिखा. टोबा टेक सिंह, खोल दो और ठंडा गोश्त जैसी कहानियां पढ़ते हुए पाठक को उस दौर की हिंसा, पागलपन और इंसानी संवेदना के टूटने का एहसास होता है.
मंटो की खासियत यह थी कि उन्होंने विभाजन को किसी बड़ी राजनीतिक बहस के पीछे छिपने नहीं दिया.
बाकी भाषाओं में भी गूंजा विभाजन
विभाजन की पीड़ा केवल हिंदी और उर्दू साहित्य तक सीमित नहीं रही. कुर्रतुलऐन हैदर का आग का दरिया इतिहास की लंबी यात्रा करते हुए 1947 तक पहुंचता है और भारतीय उपमहाद्वीप की बदलती पहचान को सामने रखता है.
खुशवंत सिंह का अंग्रेजी उपन्यास ट्रेन टू पाकिस्तान भी विभाजन साहित्य की चर्चित कृतियों में शामिल है. वहीं बाप्सी सिधवा का आइस-कैंडी-मैन, जिसे क्रैकिंग इंडिया के नाम से भी जाना जाता है, एक पारसी बच्ची की नजर से लाहौर में बदलते माहौल को दिखाता है. इन रचनाओं की भाषाएं अलग हैं, लेकिन इनके केंद्र में वही इंसान है जो अचानक इतिहास के सबसे बड़े तूफानों में से एक के बीच फंस जाता है.
इतिहास के साथ इंसान को भी याद रखना जरूरी
विभाजन को समझने के लिए दस्तावेज और राजनीतिक इतिहास जरूरी हैं. उनसे हमें पता चलता है कि फैसले कब और क्यों लिए गए. लेकिन साहित्य उस इतिहास में इंसानी चेहरा जोड़ता है.
यशपाल के पात्रों में बिखरते परिवार दिखाई देते हैं. भीष्म साहनी के यहां डर और अफवाहों से बदलता समाज नजर आता है. मंटो हमें हिंसा की ऐसी तस्वीर दिखाते हैं, जिससे नजरें चुराना आसान नहीं. अमृता प्रीतम महिलाओं के दर्द को सामने लाती हैं और राही मासूम रज़ा बताते हैं कि जमीन से जुड़ी पहचान को अचानक किसी नई सीमा में कैद करना कितना जटिल होता है.
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