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बक्सर की जंग के बाद कैसे पलटा सत्ता का पासा? जानिए इलाहाबाद संधि की पूरी कहानी

12 अगस्त 1765 की इलाहाबाद की संधि भारतीय इतिहास का निर्णायक मोड़ साबित हुई. बक्सर की लड़ाई में जीत के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी हासिल हुई.

इलाहाबाद: करीब ढाई सौ साल से भी ज्यादा पुरानी यह तारीख भारतीय इतिहास में एक ऐसे मोड़ के तौर पर दर्ज है, जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार से आगे बढ़कर सत्ता की दिशा में निर्णायक कदम उठाया था. इलाहाबाद में हुई एक संधि ने कंपनी को सिर्फ कारोबार करने वाली संस्था से निकालकर राजस्व और प्रशासन की ताकत हासिल करने वाली राजनीतिक शक्ति बना दिया.

यह समझौता मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय और ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिनिधि रॉबर्ट क्लाइव के बीच हुआ था. इसके पीछे की कहानी सीधे तौर पर 1764 की बक्सर की लड़ाई से जुड़ी थी. बक्सर में कंपनी की सेना ने मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय, अवध के नवाब शुजा-उद-दौला और बंगाल के पूर्व नवाब मीर कासिम की संयुक्त सेना को हरा दिया था. इस जीत ने कंपनी की सैन्य ताकत का प्रदर्शन तो किया ही, साथ ही उत्तर भारत की राजनीति में उसकी पकड़ भी काफी मजबूत कर दी.

बक्सर की जीत के बाद बदला सत्ता का समीकरण

बक्सर की हार के बाद मुगल सम्राट और अवध के नवाब के सामने कंपनी की शर्तों को स्वीकार करने के अलावा बहुत ज्यादा विकल्प नहीं बचे थे. इसी राजनीतिक परिस्थिति में इलाहाबाद की संधि सामने आई.

संधि का सबसे बड़ा असर बंगाल, बिहार और उड़ीसा पर पड़ा. मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय ने कंपनी को इन इलाकों की दीवानी सौंप दी. आसान भाषा में समझें तो इसका मतलब था कि इन क्षेत्रों में राजस्व यानी कर वसूलने का अधिकार कंपनी के हाथ में आ गया. उस दौर में राजस्व ही शासन की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत था. इसलिए यह अधिकार मिलना कंपनी के लिए बेहद बड़ा फायदा था.

अब कंपनी के पास केवल व्यापार से होने वाली कमाई नहीं थी, बल्कि वह एक बड़े भूभाग से नियमित राजस्व भी हासिल कर सकती थी. यही वह बदलाव था जिसने आने वाले वर्षों में उसके राजनीतिक विस्तार की नींव मजबूत की.

मुगल बादशाह को मिला सालाना भुगतान

दीवानी अधिकार देने के बदले कंपनी ने शाह आलम द्वितीय को हर साल 26 लाख रुपये देने पर सहमति जताई. यह रकम सम्राट के दरबार और उनके खर्चों के लिए निर्धारित की गई थी.

इसके साथ ही कोरा और इलाहाबाद के इलाके सम्राट के अधिकार में रखे गए. हालांकि, कागज पर मुगल बादशाह की प्रतिष्ठा और अधिकार कायम थे, लेकिन वास्तविक परिस्थितियां तेजी से बदल रही थीं. कंपनी के पास अब पैसा, सेना और प्रशासनिक प्रभाव तीनों बढ़ रहे थे.

इस संधि से यह भी साफ दिखाई देने लगा कि मुगल साम्राज्य की केंद्रीय शक्ति कितनी कमजोर हो चुकी थी. कभी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर प्रभाव रखने वाला साम्राज्य अब क्षेत्रीय शक्तियों और यूरोपीय व्यापारिक कंपनी के बीच अपनी स्थिति बचाने की कोशिश कर रहा था.

इलाहाबाद की संधि का असर अवध पर भी पड़ा. बक्सर में कंपनी से भिड़ने वाले नवाब शुजा-उद-दौला को उनका राज्य वापस कर दिया गया, लेकिन उन्हें इसके बदले भारी कीमत चुकानी पड़ी. कोरा और इलाहाबाद के जिले उनसे ले लिए गए और कंपनी को युद्ध क्षतिपूर्ति के रूप में 50 लाख रुपये देने पड़े.

इसके अलावा कंपनी और अवध के बीच सैन्य सहयोग की व्यवस्था भी बनी. कंपनी ने बाहरी दुश्मनों के खिलाफ अवध के नवाब की मदद करने का भरोसा दिया, लेकिन उस मदद के लिए भेजी जाने वाली कंपनी की सेना का खर्च नवाब को उठाना था.

देखने में यह व्यवस्था सुरक्षा देने वाली थी, लेकिन इसके पीछे एक बड़ा राजनीतिक असर छिपा था. अवध की सुरक्षा धीरे-धीरे कंपनी की सैन्य ताकत पर निर्भर होने लगी. इस तरह कंपनी ने बिना सीधे तौर पर अवध पर शासन किए वहां अपना प्रभाव बढ़ाने का रास्ता तैयार कर लिया.

व्यापारिक कंपनी से राजनीतिक ताकत तक

इलाहाबाद की संधि को भारतीय इतिहास में इसलिए खास माना जाता है क्योंकि इसने ईस्ट इंडिया कंपनी के स्वरूप को ही बदल दिया. कंपनी भारत में व्यापार करने आई थी, लेकिन अब उसके हाथ में विशाल क्षेत्रों से राजस्व वसूलने का अधिकार था.

राजस्व का मतलब सिर्फ पैसा नहीं था. इसी पैसे से सेना चल सकती थी, प्रशासन का खर्च उठाया जा सकता था और नए राजनीतिक अभियानों को वित्तीय मदद मिल सकती थी. यानी बंगाल की संपदा कंपनी के आगे के विस्तार का महत्वपूर्ण आधार बनने लगी.

यहीं से भारत में कंपनी के राजनीतिक प्रभुत्व की प्रक्रिया तेज हुई. अगले कई दशकों में उसने अलग-अलग इलाकों में अपनी सैन्य और राजनीतिक ताकत बढ़ाई और आखिरकार ब्रिटिश शासन की नींव काफी गहरी हो गई.

इतिहास में क्यों याद की जाती है यह संधि?

12 अगस्त 1765 की इलाहाबाद की संधि को केवल दो पक्षों के बीच हुआ एक सामान्य समझौता मानना सही नहीं होगा. यह उस दौर की बदलती सत्ता व्यवस्था का दस्तावेज था. एक तरफ मुगल साम्राज्य कमजोर हो रहा था, दूसरी तरफ क्षेत्रीय शासक अपनी स्थिति बचाने के लिए कंपनी से समझौते कर रहे थे और तीसरी तरफ ईस्ट इंडिया कंपनी लगातार मजबूत होती जा रही थी.

इस संधि ने कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की आर्थिक ताकत तक पहुंच दे दी. यही आर्थिक आधार बाद में उसके सैन्य और राजनीतिक विस्तार में काम आया.

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-भारत एक्सप्रेस



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