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मसालों के लिए महायुद्ध: दीव की लहरों पर पुर्तगालियों ने बदला इतिहास, 500 साल पहले ऐसे पड़ा था गुलामी का बीज

क्या आप जानते हैं कि भारत में यूरोपीय गुलामी की नींव एक ‘मसाला युद्ध’ से पड़ी थी? 3 फरवरी 1509 को दीव के तट पर लड़ी गई वह नौसैनिक जंग, जहाँ काली मिर्च और लौंग के व्यापार पर कब्जे के लिए दुनिया की महाशक्तियां आपस में भिड़ गई थीं.

Battle of Diu 1509
Edited by Vaibhav Gupta

15वीं-16वीं शताब्दी में यूरोप और एशिया के बीच व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र मसाले थे. काली मिर्च, दालचीनी, लौंग, इलायची जैसे मसाले यूरोप में सोने-चांदी के बराबर माने जाते थे. इन मसालों का व्यापार सदियों से अरब व्यापारियों, वेनिस और मिस्र के मामलूक सल्तनत के हाथों में था, जो लाल सागर और फारस की खाड़ी के रास्ते से होता था. लेकिन 1498 में वास्को डी गामा के भारत पहुंचने के बाद पुर्तगालियों ने इस व्यापार को सीधे केप ऑफ गुड होप के रास्ते यूरोप ले जाने की योजना बनाई. इससे पुराने व्यापार मार्गों को बड़ा खतरा पैदा हो गया.

इस पृष्ठभूमि में दीव की लड़ाई (Battle of Diu) हुई, जिसे इतिहास में मसालों के लिए लड़ी गई सबसे महत्वपूर्ण नौसैनिक जंग माना जाता है. यह लड़ाई 3 फरवरी 1509 को अरब सागर में, गुजरात के दीव बंदरगाह के पास लड़ी गई. इसे चौल की दूसरी जंग भी कहा जाता है.

कौन थे दोनों पक्ष?

पुर्तगाली पक्ष:

पुर्तगाल के पहले वाइसराय डॉम फ्रांसिस्को डी अल्मेडा (Dom Francisco de Almeida) के नेतृत्व में लगभग 18-19 जहाजों का बेड़ा. इनमें बड़े नौकायन जहाज थे, जो तोपों से लैस थे. इनके पास बेहतर नौसैनिक तकनीक, ब्रॉडसाइड तोपें और अनुभवी नाविक थे. अल्मेडा का उद्देश्य बदला लेना था, क्योंकि 1508 में चौल की लड़ाई में उनके बेटे की मौत हो गई थी.

संयुक्त विरोधी गठबंधन :

  • गुजरात के सुल्तान (महमूद बेगड़ा),
  • मिस्र की मामलूक सल्तनत (Burji Sultanate),
  • कालीकट (कोझिकोड) के जमोरिन (Saamoothiri),
  • ओटोमन साम्राज्य और वेनिस गणराज्य का समर्थन.

इस गठबंधन के पास सैकड़ों जहाज थे (कुछ अनुमानों में 200 तक), लेकिन ज्यादातर छोटे, उथले पानी के जहाज थे. इनमें मामलूक कमांडर मीर हुसैन पाशा (कुर्द मूल का) प्रमुख था.

कैसे हुई लड़ाई?

2 फरवरी 1509 को पुर्तगाली बेड़ा दीव पहुंचा. विरोधी जहाज बंदरगाह में सुरक्षित खड़े थे, जहां किले की तोपें उनकी रक्षा कर रही थीं. 3 फरवरी सुबह करीब 11 बजे लड़ाई शुरू हुई. पुर्तगालियों ने पहले किले और दुश्मन जहाजों पर भारी तोपों से बमबारी की. जब विरोधी जहाज बंदरगाह से बाहर नहीं निकले, तो पुर्तगालियों ने करीब आकर बोर्डिंग (जहाज पर चढ़कर लड़ाई) की.

पुर्तगालियों की आधुनिक तोपें, बेहतर जहाज और रणनीति ने निर्णायक भूमिका निभाई. लगभग 6 घंटे की लड़ाई में उन्होंने कई दुश्मन जहाजों को डुबोया, कुछ को कब्जा किया और भारी तबाही मचाई.

पुर्तगाली जीत

इस युद्ध में पुर्तगालियों के सिर्फ 32 सैनिक मारे गए, जबकि विरोधी पक्ष के हजारों (अनुमानित 3000+) मारे गए. इस जीत ने पुर्तगाल को हिंद महासागर पर नियंत्रण दिया. वे “पुर्तगाली झील” कहलाने लगा. इसके बाद पुर्तगाल ने तेजी से गोवा (1510), सीलोन (श्रीलंका), मलाका, ओरमुज जैसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों पर कब्जा किया. मसालों का व्यापार यूरोप की ओर मुड़ा, जिससे अरब, मिस्र और वेनिस का पारंपरिक व्यापार कमजोर पड़ा.बता दें कि ये लड़ाई यूरोपीय साम्राज्यवाद की शुरुआत का प्रतीक बनी, जिसने एशिया में यूरोपीय उपनिवेशवाद की नींव रखी.

हिंद महासागर में यूरोपीय युग

दीव की यह जंग सिर्फ एक नौसैनिक युद्ध नहीं थी, यह मसालों के व्यापार, समुद्री शक्ति और वैश्विक इतिहास की दिशा बदलने वाली घटना थी. पुर्तगालियों की बेहतर तकनीक और दृढ़ इच्छाशक्ति ने संख्या में भारी विरोधी गठबंधन को धूल चटा दी, और हिंद महासागर में यूरोपीय युग की शुरुआत हो गई.

यह लड़ाई आज भी इतिहासकारों द्वारा “दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण नौसैनिक युद्धों” में गिनी जाती है, क्योंकि इसने वैश्विक व्यापार के नक्शे को हमेशा के लिए बदल दिया.

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-भारत एक्सप्रेस



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