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Beant Singh Murder Mystery: 31 अगस्त 1995 की वह शाम जब चंडीगढ़ सचिवालय में गूंजा था दहला देने वाला धमाका

31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ के सिविल सचिवालय परिसर में हुए आत्मघाती बम धमाके में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह समेत 17 लोगों की मौत हो गई थी. जानिए कैसे रची गई थी इस हमले की साजिश.

Beant Singh Murder Mystery: 31 अगस्त 1995 की शाम चंडीगढ़ का पंजाब-हरियाणा सिविल सचिवालय परिसर अचानक एक जोरदार धमाके से दहल उठा. शाम करीब 5 बजकर 10 मिनट का वक्त था. पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह अपनी बुलेटप्रूफ कार की तरफ बढ़ रहे थे. उन्हें शायद अंदाजा भी नहीं था कि कुछ ही पल बाद वहां ऐसा विस्फोट होने वाला है, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई देगी.

एक आत्मघाती हमलावर ने मुख्यमंत्री के बेहद करीब पहुंचकर खुद को विस्फोट से उड़ा लिया. धमाका इतना जबरदस्त था कि मुख्यमंत्री की कार बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई. मौके पर अफरा-तफरी मच गई और आसपास मौजूद लोगों को संभलने तक का मौका नहीं मिला. इस हमले में बेअंत सिंह समेत 17 लोगों की मौत हुई. मृतकों में सुरक्षा कर्मी और तीन कमांडो भी शामिल थे.

जिस पंजाब में आतंकवाद सबसे बड़ी चुनौती बन चुका था

इस घटना को समझने के लिए उस दौर के पंजाब को याद करना जरूरी है. 1980 और 1990 के दशक में पंजाब लंबे समय तक अलगाववादी हिंसा और आतंकवाद से जूझता रहा. खालिस्तान की मांग को लेकर हिंसक गतिविधियां बढ़ती गईं और हालात इतने बिगड़े कि राज्य में कई बार राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा.

जून 1987 में भी पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया. कुछ वर्षों की कड़ी कार्रवाई के बाद हालात में धीरे-धीरे बदलाव आने लगा और 1992 में विधानसभा चुनाव हुए. कांग्रेस सत्ता में लौटी और बेअंत सिंह ने मुख्यमंत्री पद संभाला.

उनके सामने सबसे मुश्किल काम राज्य में आतंकवाद को खत्म करना था. उनकी सरकार के दौरान पंजाब पुलिस और सुरक्षा बलों ने अलगाववादी संगठनों के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान चलाया. कई आतंकवादी मारे गए, जबकि कई गिरफ्तार किए गए. दूसरी तरफ, उग्रवादी संगठनों की नजर में बेअंत सिंह उन कार्रवाइयों के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार थे. उनके खिलाफ फर्जी मुठभेड़ों जैसे आरोप भी लगाए जाते रहे.

यानी मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के साथ ही बेअंत सिंह ने एक ऐसी लड़ाई अपने सामने खड़ी देखी, जिसमें खतरा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि उनकी अपनी जान का भी था.

सचिवालय में कैसे हुआ आत्मघाती हमला?

जांच में सामने आया कि इस हमले की साजिश खालिस्तानी संगठन बाबर खालसा इंटरनेशनल यानी बीकेआई से जुड़ी थी. हमले को अंजाम देने वाला दिलावर सिंह बब्बर पंजाब पुलिस में कॉन्स्टेबल था. उसके साथ बलवंत सिंह राजोआना भी था, जो उस समय पुलिस में कॉन्स्टेबल था.

बताया गया कि दोनों ने सिक्का उछालकर यह तय किया था कि आत्मघाती हमलावर कौन बनेगा. फैसला दिलावर सिंह के पक्ष में गया.

इसके बाद दिलावर सिंह पुलिस की वर्दी में विस्फोटक बेल्ट लेकर सचिवालय परिसर पहुंचा. जैसे ही बेअंत सिंह अपनी कार में बैठने की स्थिति में थे, वह उनके पास पहुंचा और विस्फोट कर दिया.

कुछ ही सेकंड में पूरा परिसर धुएं और मलबे से भर गया. धमाके की आवाज काफी दूर तक सुनाई दी. घटना के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने पूरे इलाके को घेर लिया और जांच शुरू कर दी.

जांच के बाद कई नाम सामने आए

मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई ने की. जांच के दौरान कई लोगों को आरोपी बनाया गया. इनमें जगतार सिंह हवारा, बलवंत सिंह राजोआना और जगतार सिंह तारा समेत अन्य नाम शामिल थे. जगतार सिंह हवारा को मामले में मुख्य साजिशकर्ताओं में माना गया, जबकि कुछ आरोपी बाद में फरार घोषित किए गए.

31 जुलाई 2007 को चंडीगढ़ की विशेष सीबीआई अदालत ने इस मामले में फैसला सुनाया. अदालत ने जगतार सिंह हवारा और बलवंत सिंह राजोआना को मौत की सजा सुनाई. वहीं गुरमीत सिंह, लखविंदर सिंह और शमशेर सिंह को उम्रकैद की सजा मिली. नसीब सिंह को 10 साल की सजा सुनाई गई.

इसके बाद मामला ऊंची अदालतों तक पहुंचा. 2010 में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने अपील पर जगतार सिंह हवारा की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया. हालांकि बलवंत सिंह राजोआना की मौत की सजा बरकरार रखी गई. जगतार सिंह तारा को बाद में अलग मुकदमे में उम्रकैद की सजा सुनाई गई.

राजोआना की सजा और लंबी कानूनी प्रक्रिया

यह मामला यहीं खत्म नहीं हुआ. 2019 में गुरु नानक देव जी की 550वीं जयंती के अवसर पर केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने बलवंत सिंह राजोआना की मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने का प्रस्ताव रखा था. इसके बाद भी इस मामले में दया याचिका और दूसरी कानूनी प्रक्रियाएं लंबे समय तक चलती रहीं.

बेअंत सिंह हत्याकांड इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह किसी राज्य के मुख्यमंत्री की आत्मघाती हमले में हत्या की बड़ी घटनाओं में से एक था. उस समय यह सिर्फ पंजाब सरकार पर हमला नहीं माना गया, बल्कि इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देने वाली घटना के तौर पर देखा गया.

एक ऐसा दिन जिसे पंजाब भूल नहीं पाया

31 अगस्त 1995 का दिन पंजाब के इतिहास में बेहद दर्दनाक अध्याय बन गया. एक तरफ राज्य आतंकवाद से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ मुख्यमंत्री की हत्या ने यह दिखा दिया कि हिंसा का खतरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था.

बेअंत सिंह को उनके समर्थक और पंजाब की राजनीति को याद रखने वाले लोग आतंकवाद के खिलाफ सरकार की सख्त नीति के लिए याद करते हैं. दूसरी ओर, जिस संगठन और नेटवर्क पर इस हमले की साजिश का आरोप लगा, उसने इसे अपने नजरिए से बदले की कार्रवाई बताया.

लेकिन इस पूरी घटना का सबसे बड़ा सच उन 17 लोगों की मौत है, जिनकी जिंदगी एक पल में खत्म हो गई. चंडीगढ़ के सचिवालय परिसर में हुआ वह धमाका सिर्फ एक वीआईपी हत्या नहीं था. उसने पंजाब के उस दौर की हिंसा, राजनीति और सुरक्षा चुनौतियों की भयावह तस्वीर देश के सामने रख दी.

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-भारत एक्सप्रेस



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