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क्लाउड सीडिंग का भारतीय इतिहास, जानिए कौन थे डॉ. एस.के. बनर्जी और क्या था उनका ‘कलकत्ता प्रयोग’?

डॉ. सुधांशु कुमार बनर्जी, जिन्हें “मेघ बनर्जी” के नाम से भी जाना जाता है. उन्होंने 1952 में साधारण हाइड्रोजन गुब्बारों की मदद से क्लाउड सीडिंग का सफल प्रयोग कर इतिहास रच दिया.

आज जब कृत्रिम बारिश (क्लाउड सीडिंग) की चर्चा होती है, तो अक्सर महंगे विमान, आधुनिक तकनीक और करोड़ों रुपये के खर्च का ज़िक्र सामने आता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि करीब सात दशक पहले एक भारतीय वैज्ञानिक ने बेहद साधारण संसाधनों के सहारे ऐसा प्रयोग किया था, जिसने मौसम विज्ञान की दुनिया में नई सोच को जन्म दिया. यह कहानी है डॉ. सुधांशु कुमार बनर्जी की, जिन्हें बाद में लोग प्यार से “मेघ बनर्जी” कहने लगे.

देश को आज़ादी मिले कुछ ही साल हुए थे. भारत विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहा था. उस समय क्लाउड सीडिंग यानी बादलों से कृत्रिम बारिश कराने की तकनीक दुनिया के लिए भी नई थी. अमेरिका जैसे देशों में इस दिशा में प्रयोग हो रहे थे, लेकिन वहां विमानों और महंगे उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता था.

भारत में ऐसे संसाधन आसानी से उपलब्ध नहीं थे. ऐसे में डॉ. बनर्जी ने सोचा कि अगर महंगे विमान नहीं हैं, तो क्या कोई आसान और कम खर्च वाला रास्ता निकाला जा सकता है? इसी सवाल ने उन्हें एक अलग दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया.

गुब्बारों से शुरू हुआ अनोखा प्रयोग

डॉ. बनर्जी ने जादवपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज, जिसे आज जादवपुर यूनिवर्सिटी के नाम से जाना जाता है, में अपनी छोटी-सी प्रयोगशाला से काम शुरू किया. उन्होंने लगभग दो वर्षों तक बंद वातावरण में लगातार परीक्षण किए. हर प्रयोग से सीखते हुए उन्होंने अपनी तकनीक को बेहतर बनाया.

जब उन्हें अपने प्रयोग पर भरोसा हो गया, तब उन्होंने खुले आसमान में इसकी परीक्षा लेने का फैसला किया. हाइड्रोजन से भरे गुब्बारों पर छोटे-छोटे उपकरण लगाए गए. इन उपकरणों में सिल्वर आयोडाइड का वाष्प, ड्राई आइस और नियंत्रित मात्रा में बारूद का उपयोग किया गया था. गुब्बारे तय ऊंचाई तक पहुंचने के बाद इन पदार्थों को बादलों में छोड़ते थे, जिससे क्लाउड सीडिंग की प्रक्रिया पूरी होती थी.

1952 में मिला ऐतिहासिक परिणाम

साल 1952 में कोलकाता के ऊपर किए गए इस प्रयोग ने उम्मीद से बेहतर नतीजे दिए. बताया जाता है कि प्रयोग लगभग पूरी तरह सफल रहा और बारिश हुई. उस समय यह उपलब्धि बेहद महत्वपूर्ण मानी गई क्योंकि भारत ने सीमित संसाधनों के बावजूद मौसम विज्ञान के क्षेत्र में एक साहसिक कदम उठाया था.

यह सफलता केवल एक वैज्ञानिक प्रयोग नहीं थी, बल्कि इस बात का प्रमाण भी थी कि नई सोच और लगातार मेहनत कई बार संसाधनों की कमी पर भारी पड़ सकती है.

बेहद कम खर्च में हुआ था पूरा प्रयोग

इस प्रयोग की सबसे दिलचस्प बात इसका खर्च था. पूरे अभियान पर करीब 18 हजार रुपये खर्च हुए थे, जो उस समय भी अपेक्षाकृत कम माने जाते थे. आज के दौर में कृत्रिम बारिश के कई प्रयोग करोड़ों रुपये की लागत से किए जाते हैं. ऐसे में डॉ. बनर्जी का यह प्रयास उनकी वैज्ञानिक समझ, व्यावहारिक सोच और नवाचार का शानदार उदाहरण माना जाता है.

डॉ. सुधांशु कुमार बनर्जी ने आगे चलकर भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के पहले भारतीय महानिदेशक के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं. उन्हें केवल एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि एक समर्पित वैज्ञानिक और शोधकर्ता के रूप में भी याद किया जाता है.

उनके परिवार के सदस्य, विशेषकर उनके पोते रंजन बनर्जी, कई मौकों पर यह बताते रहे हैं कि डॉ. बनर्जी का विज्ञान के प्रति समर्पण असाधारण था. वे हर चुनौती को सीखने और कुछ नया करने का अवसर मानते थे.

वैज्ञानिक संस्थानों ने भी माना योगदान

भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) ने भी स्वीकार किया है कि 1952 में कलकत्ता में डॉ. एस.के. बनर्जी ने वर्षा उत्पादन के क्षेत्र में शुरुआती और महत्वपूर्ण प्रयास किए थे. यह इस बात का संकेत है कि उनके प्रयोगों को भारतीय मौसम विज्ञान के इतिहास में विशेष स्थान प्राप्त है.

आज भी प्रेरणा देती है यह कहानी

डॉ. बनर्जी की कहानी केवल कृत्रिम बारिश कराने की तकनीक तक सीमित नहीं है. यह उस सोच की कहानी है, जिसमें कठिन परिस्थितियों के बावजूद हार नहीं मानी जाती. जब लोग किसी विचार को असंभव मान रहे थे, तब उन्होंने अपने विश्वास और मेहनत के दम पर उसे वास्तविकता में बदलकर दिखाया.

आज जलवायु परिवर्तन, सूखे और अनियमित बारिश जैसी चुनौतियां दुनिया के सामने खड़ी हैं. ऐसे समय में डॉ. सुधांशु कुमार बनर्जी की यह यात्रा याद दिलाती है कि विज्ञान केवल महंगी तकनीकों का नाम नहीं है. कई बार सबसे बड़े बदलाव साधारण विचारों, सीमित संसाधनों और अटूट जिज्ञासा से भी संभव हो जाते हैं. यही कारण है कि “मेघ बनर्जी” की यह कहानी आज भी वैज्ञानिक सोच, नवाचार और दृढ़ संकल्प की मिसाल मानी जाती है.

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-भारत एक्सप्रेस



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