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विदेशी माटी से उपजा हिंदी का सच्चा साधक, जानिए फादर कामिल बुल्के की अनकही कहानी

हिंदी को भारत में शोधपरक विस्तार देने में अहम भूमिका निभाने वाला एक प्रमुख नाम विदेशी मूल का ही है. फादर कामिल बुल्के का जीवन भारतीय भाषा, विशेषकर हिंदी के प्रति गहरे प्रेम और समर्पण का अद्वितीय उदाहरण है.

हिंदी के विकास और उसके गंभीर अध्ययन की बात होती है तो कई बड़े भारतीय विद्वानों के साथ एक ऐसा नाम भी सामने आता है, जो जन्म से भारतीय नहीं थे. यह नाम है फादर कामिल बुल्के का. बेल्जियम में जन्मे बुल्के ने अपनी पूरी जिंदगी भारत, हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति को समझने और आगे बढ़ाने में लगा दी. हिंदी के प्रति उनका लगाव इतना गहरा था कि समय के साथ यह भाषा उनके लिए सिर्फ अध्ययन का विषय नहीं रही, बल्कि उनकी पहचान का हिस्सा बन गई.

फादर कामिल बुल्के का जन्म 1 सितंबर 1909 को बेल्जियम के वेस्ट फ्लैंडर्स प्रांत के रम्सकपैले गांव में हुआ था. शुरुआती पढ़ाई के बाद उन्होंने इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल की. लेकिन जिंदगी ने उनके लिए कुछ और तय कर रखा था. साल 1930 में उन्होंने जेसुइट ऑर्डर में प्रवेश लिया और 1935 में भारत आ पहुंचे.

भारत आने के बाद उनका परिचय यहां की भाषाओं, साहित्य और संस्कृति से हुआ. हिंदी ने उन्हें खास तौर पर प्रभावित किया. उन्होंने इस भाषा को केवल बोलचाल का माध्यम नहीं माना, बल्कि भारतीय समाज की भावनाओं और सांस्कृतिक चेतना को समझने का जरिया माना. धीरे-धीरे हिंदी उनके अध्ययन और जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई.

हिंदी को समझने के लिए खुद को झोंक दिया

बुल्के ने हिंदी सीखने के साथ-साथ संस्कृत और भारतीय साहित्य का भी गहराई से अध्ययन किया. उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से संस्कृत में डिग्री हासिल की और बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. किया. यहीं उन्होंने हिंदी में शोध का ऐसा काम किया, जिसने उन्हें अलग पहचान दिलाई.

उनका चर्चित शोध-प्रबंध “रामकथा : उत्पत्ति और विकास” 1949-50 के दौरान सामने आया. इसमें रामकथा के अलग-अलग भारतीय और एशियाई रूपों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया था. यह हिंदी में लिखा गया शुरुआती महत्वपूर्ण डॉक्टरेट शोध था और आज भी रामकथा के अध्ययन में इसे बेहद उपयोगी माना जाता है.

बुल्के की भाषा को लेकर सोच भी काफी दिलचस्प थी. वे संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी के संबंध को एक बेहद सहज अंदाज में समझाते हुए कहते थे—“संस्कृत महारानी है, हिन्दी बहूरानी और अंग्रेजी नौकरानी.” इस एक वाक्य से हिंदी के प्रति उनका लगाव साफ झलकता है.

शब्दकोश से लेकर धर्मग्रंथों के अनुवाद तक

फादर बुल्के ने हिंदी के लिए सिर्फ शोध नहीं किया, बल्कि ऐसी किताबें और संदर्भ सामग्री भी तैयार की, जिनका इस्तेमाल लंबे समय तक होता रहा. साल 1968 में प्रकाशित “अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश” उनका सबसे प्रसिद्ध काम माना जाता है. छात्रों, शिक्षकों, अनुवादकों और हिंदी सीखने वालों के बीच इस शब्दकोश की खास जगह बनी.

इससे पहले उन्होंने 1955 में तकनीकी अंग्रेजी-हिंदी शब्दावली भी तैयार की थी. इसके अलावा उन्होंने ईसाई धर्मग्रंथों का हिंदी में अनुवाद किया. “नया विधान” और “मुक्तिदाता” उनके प्रमुख अनुवाद कार्यों में शामिल हैं.

भारत को बनाया अपना देश

रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज में उन्होंने हिंदी और संस्कृत विभाग के अध्यक्ष के रूप में लंबे समय तक अध्यापन और शोध किया. साल 1951 में उन्होंने भारतीय नागरिकता स्वीकार की. इसके बाद वे खुद को भारतीय और बिहारी कहने में भी गर्व महसूस करते थे.

हिंदी, साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 1974 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया. यह सम्मान उनके वर्षों के काम की बड़ी पहचान बना.

फादर कामिल बुल्के का निधन 17 अगस्त 1982 को दिल्ली में हुआ. लेकिन उनकी किताबें, शोध और हिंदी के प्रति उनका नजरिया आज भी उन्हें याद रखने की वजह हैं.

बुल्के का जीवन एक ऐसी मिसाल है, जो बताता है कि किसी भाषा से जुड़ने के लिए उस भाषा को जन्म से बोलना जरूरी नहीं है. अगर सीखने की इच्छा और सेवा का भाव हो, तो दूसरी भाषा भी अपनी लगने लगती है. उन्होंने हिंदी को सिर्फ सीखा नहीं, बल्कि उसके साहित्य, इतिहास और संस्कृति को समझने में अपना पूरा जीवन लगा दिया.

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-भारत एक्सप्रेस



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