Gaurishankar Rai Death Anniversary: भारतीय लोकतंत्र और सांस्कृतिक आत्मसम्मान के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो अपनी दृढ़ता और देशभक्ति से न केवल व्यक्तिगत उपलब्धियां हासिल करते हैं, बल्कि पूरे राष्ट्र की गरिमा को भी ऊंचा उठाते हैं. ऐसे ही महान व्यक्तित्व थे गौरीशंकर राय, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी भाषा को प्रतिष्ठा दिलाने का सूत्रधार माना जाता है.
बलिया जिले के करनई गांव में जन्मे गौरीशंकर राय एक संपन्न परिवार से थे. काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे छात्रावस्था से ही स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े. देश की आजादी के बाद वे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े और बलिया में जिला महामंत्री के रूप में कार्यरत रहे. इसी दौरान उन्होंने युवा चंद्रशेखर को पार्टी का सदस्य बनाया, जो बाद में देश के प्रधानमंत्री बने.
राजनीतिक सफर
1957 में गौरीशंकर राय बलिया से उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए. 1977 में वे गाजीपुर लोकसभा क्षेत्र से संसद सदस्य निर्वाचित हुए. जनता पार्टी सरकार के दौरान 1978 में उन्हें एक ऐतिहासिक अवसर मिला. वे तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधिमंडल में शामिल हुए.
संयुक्त राष्ट्र में हिंदी का ऐतिहासिक संबोधन
संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने के समय गौरीशंकर राय जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा- “मैं सिर्फ हिंदी में ही संबोधित करूंगा.”
ये फैसला आसान नहीं था. अनुवाद की व्यवस्था और प्रोटोकॉल संबंधी अड़चनों के कारण विवाद खड़ा हो गया. मामला नई दिल्ली पहुंचा और तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई तक गया. मोरारजी भाई ने राय साहब के पक्ष में फैसला सुनाया और कहा कि वे ठीक कह रहे हैं.
गौरीशंकर राय जी के अथक प्रयासों से अनुवाद संबंधित समस्याओं का समाधान निकाला गया. अंततः विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सर्वप्रथम हिंदी में संबोधन दिया और इसके बाद गौरीशंकर राय जी ने भी हिंदी में अपना भाषण प्रस्तुत किया. ये भारतीय भाषा और सांस्कृतिक आत्मसम्मान की बड़ी जीत थी. उन्होंने न केवल हिंदी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित किया, बल्कि ये साबित किया कि भारत अपनी भाषा, संस्कृति और परंपरा पर गर्व कर सकता है.
देहांत और विरासत
2 मई 1991 को उनका देहांत हुआ. उस समय तत्कालीन कार्यवाहक प्रधानमंत्री चंद्रशेखर बिहार चुनाव प्रचार में थे. सूचना मिलते ही वे तुरंत बलिया पहुंचे और शव यात्रा में नंगे पांव पैदल चले. ये उनके प्रति गहरे सम्मान और लगाव का प्रतीक था.
आज जब हम व्यक्ति के बजाय पार्टी को वोट देते हैं, तब गौरीशंकर राय जैसे व्यक्तित्व हमें याद दिलाते हैं कि सच्चे और समर्पित नेताओं को पहचानना और उन्हें चुना जाना कितना जरूरी है. अगर हम अच्छे व्यक्तियों को वोट करना सीख जाएं, तो ऐसे अनेक गौरीशंकर राय देश की विधायिका में पहुंचकर राष्ट्र को वैभवशाली बनाने में योगदान दे सकते हैं.
उनके द्वारा हिंदी को संयुक्त राष्ट्र महासभा जैसे विश्व मंच पर प्रतिष्ठा दिलाने का कार्य भारतीय भाषा प्रेमियों और राष्ट्रवादी विचारधारा के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बना रहेगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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