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मजदूर दिवस 2026: कौन थे सिंगरावेलु चेट्टियार? जिन्होंने 103 साल पहले मद्रास के बीच पर भरी थी हुंकार

भारत में मजदूर दिवस की शुरुआत 1923 में मलयपुरम सिंगरावेलु चेट्टियार ने की थी. एक वकील और कम्युनिस्ट नेता के रूप में उन्होंने पहली बार भारत में लाल झंडा फहराया और मजदूरों के लिए 8 घंटे काम की मांग की.

May Day History in India: Know about Singaravelu Chettiar who started Labour Day in 1923
Edited by Vaibhav Gupta

भारत में 1 मई को मजदूर दिवस (May Day या International Workers’ Day) के रूप में मनाने की परंपरा की शुरुआत मलयपुरम सिंगरावेलु चेट्टियार (जिन्हें M. Singaravelar या Singaravelu के नाम से भी जाना जाता है) ने की थी. वर्ष 1923 में, जब देश ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के अधीन था और मजदूर वर्ग अत्यधिक शोषण, लंबे काम के घंटों तथा दयनीय परिस्थितियों का सामना कर रहा था, तब मद्रास (अब चेन्नई) में उन्होंने इस दिन को मजदूरों के संघर्ष और एकता का प्रतीक बनाया.

प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि

मलयपुरम सिंगरावेलु चेट्टियार का जन्म 18 फरवरी 1860 को चेन्नई में एक मछुआरा परिवार में हुआ था. उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की और वकील के रूप में कार्य किया. शुरू में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे. लेकिन बाद में वे मजदूरों और किसानों की स्थिति से प्रभावित होकर समाजवादी और कम्युनिस्ट विचारधारा की ओर मुड़े.

वे बहुभाषाविद् थे और जर्मन, फ्रेंच तथा रूसी भाषाओं का ज्ञान रखते थे. उन्होंने मार्क्सवादी साहित्य का अध्ययन किया और तमिल में कई महत्वपूर्ण लेख लिखे.

भारत का पहला मजदूर दिवस

1 मई 1923 को सिंगरावेलु चेट्टियार ने मद्रास में भारत का पहला मई दिवस आयोजित किया. इसमें दो प्रमुख सभाएं हुईं. एक सभा मैरिना बीच (मद्रास हाईकोर्ट के सामने) पर, जिसकी अध्यक्षता खुद सिंगरावेलु ने की, वहीं, दूसरी सभा त्रिप्लिकेन बीच (Triplicane Beach) पर.

इन सभाओं में उन्होंने लाल झंडा (Red Flag) पहली बार भारत की धरती पर फहराया, जो दुनिया भर के मजदूर आंदोलन का प्रतीक था. इस मौके पर उन्होंने लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान (Labour Kisan Party of Hindustan) की स्थापना की घोषणा की. ये भारत का पहला राजनीतिक संगठन था जो विशेष रूप से मजदूरों और किसानों के हितों के लिए समर्पित था.

सभा में उन्होंने 8 घंटे के काम के दिन, बेहतर मजदूरी, सामाजिक कल्याण और मजदूरों के लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग की. उन्होंने कहा कि “1 मई मजदूरों के लिए पवित्र दिन है” और भारत में भी इस दिन को मजदूर एकता का प्रतीक बनाना चाहिए.

विशेष बात : लाल झंडा सिलने के लिए उन्होंने अपनी बेटी कमला की साड़ी का इस्तेमाल किया था.

प्रमुख योगदान

  • ट्रेड यूनियन आंदोलन के अग्रदूत : 1918 में उन्होंने भारत का पहला ट्रेड यूनियन मद्रास लेबर यूनियन स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई (बकिंघम और कार्नाटिक मिल्स के मजदूरों के लिए)
  • कम्युनिस्ट आंदोलन में योगदान: वे दक्षिण भारत के पहले कम्युनिस्ट नेताओं में से एक थे. 1925 में कानपुर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना सम्मेलन की अध्यक्षता उन्होंने की
  • सामाजिक सुधार: उन्होंने अस्पृश्यता के खिलाफ आवाज उठाई, सेल्फ-रिस्पेक्ट मूवमेंट (पेरियार के साथ) से जुड़े और विज्ञान, तर्कशीलता तथा शिक्षा के प्रसार के लिए काम किया.
  • उन्होंने मजदूरों को संगठित करने के साथ-साथ तमिल में कम्युनिस्ट विचारों का प्रचार किया और कई हड़तालों का नेतृत्व किया.

सम्मान सिर्फ भाषणों में न हो

सिंगरावेलु का मुख्य संदेश था कि ‘सम्मान सिर्फ भाषणों में नहीं, व्यवस्था में भी चाहिए!’ वे मानते थे कि मजदूरों और किसानों को सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक न्याय भी मिलना चाहिए.

उनकी लेबर किसान पार्टी अल्पकालिक रही (1925 में यह CPI में विलय हो गई), लेकिन इसका प्रभाव गहरा और स्थायी रहा. आज भी चेन्नई के त्रिप्लिकेन बीच पर ‘Triumph of Labour’ (मजदूर की जीत) की मूर्ति उनकी इस ऐतिहासिक पहल की याद दिलाती है.

कम्युनिस्ट नेता और सामाजिक सुधारक

मलयपुरम सिंगरावेलु चेट्टियार का निधन 11 फरवरी 1946 को हुआ. वे वकील से ट्रेड यूनियनिस्ट, कांग्रेस कार्यकर्ता से कम्युनिस्ट नेता और सामाजिक सुधारक तक बने.

आज जब हम मजदूर दिवस मनाते हैं, तो हमें इस बात का गर्व होना चाहिए कि भारत में इस परंपरा की नींव एक साधारण मछुआरा परिवार के बेटे ने रखी थी, जिसने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध मजदूरों की आवाज को संगठित रूप दिया.

‘दुनिया के मजदूरों, एक हो!’- ये नारा आज भी प्रासंगिक है, और सिंगरावेलु चेट्टियार उस एकता के प्रतीक बने हुए हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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