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बनारस से भारत मंडपम तक, जानिए क्यों ‘ग्लोबल साउथ’ की सबसे बड़ी आवाज बन रहा है भारत का ‘ब्रिक्स मॉडल’?

जब भी हम अंतरराष्ट्रीय मंचों और ब्रिक्स (BRICS) जैसे बड़े संगठनों की बात करते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में बड़ी-बड़ी बैठकें और समझौतों के कागजात आते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में भारत की ब्रिक्स कूटनीति सिर्फ प्रोटोकॉल तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें एक गहरी सिविलिज़ेशनल सोच दिखती है.

जब भी हम अंतरराष्ट्रीय मंचों और ब्रिक्स (BRICS) जैसे बड़े संगठनों की बात करते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में बड़ी-बड़ी बैठकें, समझौतों के कागजात, महंगे सूट पहने नेता और सीट्स की क्राउड-मैनेजमेंट जैसी बातें आती हैं. लेकिन क्या कूटनीति सिर्फ इतनी सी है? भारत ने दुनिया के सामने इस सोच को एक नया मोड़ दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में भारत की ब्रिक्स कूटनीति सिर्फ प्रोटोकॉल तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें एक गहरी सिविलिज़ेशनल सोच दिखती है—एक ऐसा भाव जहां आम इंसान, उसका सम्मान, विकास और आपसी बातचीत वैश्विक राजनीति के केंद्र में हो.

बनारस की तंग गलियों और सांस्कृतिक विरासत से लेकर दिल्ली के अत्याधुनिक भारत मंडपम तक, भारत का संदेश बिल्कुल साफ रहा है. वह यह कि आज की दुनिया में ताकत का मतलब सिर्फ धौंस जमाना नहीं होना चाहिए, बल्कि ताकत को मानवता के प्रति जवाबदेह होना पड़ेगा. आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर इस पूरी कूटनीति के मायने क्या हैं और यह आम आदमी के जीवन से कैसे जुड़ी है.

‘मानवता पहले’ (Humanity First) का मतलब क्या है?

जब हम ‘मानवता पहले’ की बात करते हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग को केवल देशों के बीच का सौदा नहीं समझा जाना चाहिए. यह सोचना जरूरी है कि क्या दुनिया के बड़े फैसले किसी आम इंसान के जीवन को बेहतर बना रहे हैं या नहीं?

भारत की अध्यक्षता के दौरान इस बात पर जोर दिया गया कि ब्रिक्स सिर्फ एलीट नेताओं का क्लब बनकर न रह जाए, बल्कि यह आम जनता की उम्मीदों से जुड़े. इसमें मुख्य रूप से चार बातों लचीलापन (Resilience), इनोवेशन, आपसी सहयोग और स्थिरता (Sustainability) पर फोकस रहा.

यही वजह है कि यह सोच भारत के मिजाज से पूरी तरह मेल खाती है. बनारस (काशी) हमें हमारी जड़ों, परंपराओं, आपसी मेल-जोल और एक साथ जीने का पाठ पढ़ाता है. वहीं दूसरी तरफ, भारत मंडपम एक आधुनिक, आश्वस्त और चमकते हुए भारत की तस्वीर पेश करता है. जब इन दोनों को मिलाते हैं, तो एक बहुत ही खूबसूरत संदेश सामने आता है कि भारत अपनी प्राचीन मानवीय समझ और ज्ञान को एक नए वैश्विक मंच पर लेकर आ रहा है.

साल 2023 के जोहान्सबर्ग सम्मेलन से बदली थी हवा

अगर हमें इस पूरी यात्रा को समझना है, तो हमें साल 2023 के उस पल को याद करना होगा जिसने इतिहास बदल दिया था. दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में हुआ 15वां ब्रिक्स सम्मेलन एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. इस समिट ने ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) को यह उम्मीद दी कि उनके हितों की बात भी बड़े मंचों पर सुनी जा सकती है.

इस समिट का थीम ‘BRICS और अफ्रीका: पारस्परिक रूप से त्वरित विकास, सतत विकास और समावेशी बहुपक्षवाद के लिए साझेदारी’ था. इस सम्मेलन में अफ्रीका को कोई पिछलग्गू मुद्दा नहीं माना गया, बल्कि उसके विकास को मुख्यधारा में जगह दी गई.

प्रधानमंत्री मोदी ने जोहान्सबर्ग में महात्मा गांधी और टॉलस्टॉय फार्म का जिक्र करके एक भावनात्मक रिश्ता जोड़ा. उन्होंने बताया कि कैसे उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाई की यादें और आज का सहयोग एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. उन्होंने युवाओं के शिखर सम्मेलन (Youth Summit), ब्रिक्स गेम्स और थिंक टैंक काउंसिल जैसे मंचों के जरिए लोगों से लोगों के बीच के रिश्तों को मजबूत करने पर जोर दिया.

ग्लोबल साउथ की आवाज क्यों बन रहा है ब्रिक्स?

आज दुनिया के कई विकासशील देश यह महसूस करते हैं कि वैश्विक व्यवस्था उनके साथ न्याय नहीं कर रही है. चाहे वह वैश्विक वित्त (Global Finance) का मामला हो, तकनीक तक पहुंच हो या बड़े फैसलों में हिस्सेदारी हो—अमीर देशों का पलड़ा हमेशा भारी रहता है. पीएम मोदी ने 2026 के अपने भाषणों में भी इस बात पर जोर दिया कि जिन देशों पर संकटों की सबसे ज्यादा मार पड़ती है, वही फैसले लेने की मेज से बाहर कर दिए जाते हैं. उन्होंने ‘विशेषाधिकार’ की जगह ‘साझेदारी’ (Partnership) अपनाने की बात कही.

यही कारण है कि ब्रिक्स किसी सैन्य गठबंधन या वैचारिक गुट की तरह काम नहीं करता. इसके सदस्य देशों की अपनी अलग राजनीतिक प्रणालियां हैं, लेकिन सबको जोड़ने वाली एक ही डोर है—एक ऐसी बहुध्रुवीय दुनिया की चाह, जहां विकासशील देश केवल नियम मानने वाले (Rule-takers) न बनकर रहें, बल्कि नियम तय करने में भी उनकी बराबर की हिस्सेदारी हो.

जब ब्रिक्स का दायरा बढ़ा, तो जिम्मेदारियां भी बढ़ीं

पिछले कुछ सालों में ब्रिक्स का विस्तार तेजी से हुआ है. कभी इसमें सिर्फ ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हुआ करते थे, लेकिन अब इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और इंडोनेशिया जैसे देश भी शामिल हो चुके हैं.

जाहिर है, जब परिवार बड़ा होता है, तो उसकी ताकत भी बढ़ती है और चुनौतियां भी. अब इस समूह में ऊर्जा के निर्यातक और आयातक दोनों तरह के देश हैं. लोकतंत्र भी हैं और अलग व्यवस्थाएं भी. ऐसे में अगर कोई साझा एजेंडा न हो, तो यह मंच केवल बयानबाजी बनकर रह जाएगा. यहीं पर भारत का ‘मानवता पहले’ वाला फॉर्मूला काम आता है, जो इन तमाम विविधताओं के बीच एक इंसानी नजरिया और व्यावहारिक दिशा देता है.

एक जन-केंद्रित ब्रिक्स का असली एजेंडा क्या होना चाहिए?

अगर इस समूह को वाकई आम लोगों के लिए काम करना है, तो इसका फोकस कुछ चुनिंदा और ठोस मुद्दों पर होना चाहिए:

  • विकास वित्त (Development Finance): बुनियादी ढांचे के विकास के लिए ऐसा कर्ज देना जो देशों को कर्ज के जाल में न फंसाए.
  • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): भारत के डिजिटल पहचान और पेमेंट मॉडल जैसी तकनीकों को साझा करना ताकि समावेशी विकास हो सके.
  • जलवायु लचीलापन: कमजोर देशों को जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने में मदद करना.
  • स्वास्थ्य सहयोग: स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ता और आसान बनाना ताकि महामारी या अन्य संकटों से निपटा जा सके.
  • युवा और कौशल: युवाओं को रोजगार, इनोवेशन और आंत्रप्रेन्योरशिप के नए मौके देना.

इन मुद्दों पर काम करने के लिए यह जरूरी नहीं है कि सभी देश हर भू-राजनीतिक मुद्दे पर एक ही राय रखें. जरूरत इस बात की है कि व्यावहारिक मामलों में मिलकर काम किया जाए.

कूटनीति को भावनाओं से आगे ले जाकर रणनीति बनाना

भारत की इस कूटनीति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह सिर्फ इमोशनल बातें नहीं करती, बल्कि मानवता को एक रणनीति (Strategy) के रूप में देखती है. आज की इस टूटी हुई दुनिया में देश सिर्फ सौदेबाजी के दम पर लंबे समय तक साथ नहीं चल सकते. उन्हें जोड़ने के लिए एक ऐसी भाषा चाहिए जो जलवायु, अर्थव्यवस्था, तकनीक और स्वास्थ्य को एक पिरो सके.

बनारस से लेकर भारत मंडपम तक की यह यात्रा यही बताती है कि भारत एक प्राचीन और परिपक्व सभ्यता के रूप में दुनिया के सामने खड़ा है, जो एक लोकतांत्रिक ताकत भी है और विकास का सच्चा साझीदार भी. ब्रिक्स तब सबसे ज्यादा मायने रखेगा जब वह यह याद रखेगा कि वैश्विक कूटनीति का आखिरी पैमाना कोई प्रोटोकॉल या ओहदा नहीं, बल्कि उस देश के आम नागरिक की खुशहाली है.

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-भारत एक्सप्रेस



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