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भारत की पहली IVF बेबी हर्षा चावड़ा, 40 साल पहले कैसे विज्ञान ने लिखी थी असंभव को संभव करने की कहानी

6 अगस्त 1986 को मुंबई के केईएम अस्पताल में जन्मी हर्षा चावड़ा ने भारतीय चिकित्सा इतिहास में एक नया अध्याय लिखा है.

6 अगस्त 1986 का दिन भारतीय चिकित्सा इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा. इसी दिन मुंबई के केईएम अस्पताल में एक बच्ची ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया हर्षा चावड़ा. वह सिर्फ अपने परिवार के लिए खुशियों की सौगात नहीं थीं, बल्कि पूरे देश के लिए उम्मीद, विज्ञान और नई सोच की शुरुआत का प्रतीक बन गईं. हर्षा को भारत की पहली वैज्ञानिक रूप से दर्ज की गई IVF (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) बेबी माना जाता है.

आज IVF तकनीक काफी सामान्य मानी जाती है, लेकिन करीब चार दशक पहले हालात बिल्कुल अलग थे. उस समय न तो तकनीक इतनी विकसित थी और न ही लोगों में इसके प्रति भरोसा था. समाज में कई तरह की भ्रांतियां थीं और चिकित्सा क्षेत्र में भी इसे लेकर कई चुनौतियां मौजूद थीं.

हर्षा की मां मनीबेन चावड़ा के लिए प्राकृतिक तरीके से गर्भधारण संभव नहीं था. उनकी फैलोपियन ट्यूब तपेदिक (टीबी) के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हो चुकी थीं. ऐसे में सामान्य रूप से मां बनना लगभग असंभव माना जा रहा था. लेकिन यहीं से विज्ञान ने उम्मीद की नई राह दिखाई.

डॉ. इंदिरा हिंदुजा ने रचा इतिहास

प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. इंदिरा हिंदुजा और उनकी टीम ने हार मानने के बजाय समाधान तलाशा. IVF तकनीक के जरिए अंडाणु और शुक्राणु का निषेचन प्रयोगशाला में कराया गया. इसके बाद तैयार हुए भ्रूण को नवंबर 1985 में मनीबेन के गर्भाशय में प्रत्यारोपित किया गया. कई महीनों की सावधानी और चिकित्सा निगरानी के बाद 6 अगस्त 1986 को सीजेरियन ऑपरेशन के माध्यम से हर्षा का सुरक्षित जन्म हुआ.

यह सिर्फ एक सफल डिलीवरी नहीं थी, बल्कि भारतीय चिकित्सा विज्ञान की बड़ी उपलब्धि थी. इस सफलता ने यह साबित कर दिया कि आधुनिक प्रजनन तकनीक उन परिवारों के लिए भी उम्मीद बन सकती है, जिनके लिए पहले संतान का सपना अधूरा रह जाता था.

लाखों परिवारों को मिली नई उम्मीद

इस ऐतिहासिक सफलता के बाद भारत में असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) को नई पहचान मिली. डॉ. इंदिरा हिंदुजा ने आगे चलकर GIFT तकनीक और ओसाइट डोनेशन जैसी आधुनिक विधियों के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया. उनके शोध और वर्षों की मेहनत ने देश में बांझपन के इलाज के क्षेत्र को नई दिशा दी.

धीरे-धीरे IVF तकनीक देशभर में फैलने लगी. पहले जहां इसे केवल कुछ बड़े अस्पतालों तक सीमित माना जाता था, वहीं आज यह सुविधा भारत के कई शहरों में उपलब्ध है. बढ़ती जागरूकता, बेहतर चिकित्सा सुविधाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की मदद से लाखों दंपतियों का माता-पिता बनने का सपना पूरा हो चुका है.

एक भावुक संयोग जिसने सबको हैरान किया

हर्षा चावड़ा की कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू कई साल बाद सामने आया. जब हर्षा खुद मां बनीं, तब उनके बच्चों का जन्म भी डॉ. इंदिरा हिंदुजा की देखरेख में हुआ. यानी जिस डॉक्टर ने हर्षा को इस दुनिया में आने में मदद की थी, उसी डॉक्टर ने उनकी अगली पीढ़ी के जन्म में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

यह घटना सिर्फ एक संयोग नहीं, बल्कि विज्ञान की सफलता और भरोसे का जीवंत उदाहरण बन गई. इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि IVF से जन्म लेने वाले बच्चे पूरी तरह सामान्य, स्वस्थ और सामान्य जीवन जीने में सक्षम होते हैं.

40 साल बाद बदल चुकी है तस्वीर

आज, लगभग 40 साल बाद, IVF भारत में लाखों परिवारों की जिंदगी बदल चुका है. अनुमान है कि इस तकनीक की मदद से देश में 5 लाख से अधिक बच्चों का जन्म हो चुका है. जो तकनीक कभी नई और चुनौतीपूर्ण मानी जाती थी, वह अब आधुनिक चिकित्सा का एक अहम हिस्सा बन चुकी है. देशभर में हजारों फर्टिलिटी क्लीनिक, बेहतर रिसर्च और जागरूकता अभियान इस बदलाव को लगातार आगे बढ़ा रहे हैं.

हर्षा चावड़ा की कहानी केवल एक बच्ची के जन्म की कहानी नहीं है. यह उस दौर की कहानी है जब विज्ञान ने असंभव लगने वाले सपने को हकीकत में बदल दिया. यह एक मां के अटूट विश्वास, एक डॉक्टर की वर्षों की मेहनत और चिकित्सा विज्ञान की उस उपलब्धि की कहानी है जिसने लाखों परिवारों के जीवन में नई रोशनी भर दी. यही वजह है कि 6 अगस्त 1986 भारतीय चिकित्सा इतिहास का एक ऐसा दिन माना जाता है, जिसने उम्मीद को नया अर्थ दिया.

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भारत एक्सप्रेस



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