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न पेपर, न नंबर… फिर भी कोर्ट को गुमराह करने पहुंचे 4 ‘NEET अभ्यर्थी’, पकड़े गए तो निकल गई हेकड़ी

री-NEET परीक्षा के OMR विवाद पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने चारों याचिकाएं खारिज कर दीं. जानिए छात्रों के आरोप, NTA के रिकॉर्ड, कोर्ट की टिप्पणी और पूरे मामले की टाइमलाइन.

Bombay High Court Re-NEET Case

Bombay High Court Re-NEET Case: NEET पेपर लीक विवाद के बीच आयोजित री-NEET परीक्षा का परिणाम भी कुछ समय के लिए बड़े विवाद का कारण बन गया था. चार छात्रों ने बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद खंडपीठ में याचिका दाखिल कर आरोप लगाया कि उनके परिणाम में गड़बड़ी हुई है और उनकी OMR शीट बदल दी गई है. उस समय देशभर में परीक्षा प्रणाली को लेकर पहले से ही अविश्वास का माहौल था. ऐसे में इन आरोपों ने मामला और गंभीर बना दिया. हालांकि अदालत में हुई सुनवाई के बाद तस्वीर कुछ अलग ही सामने आई और अंततः कोर्ट ने सभी याचिकाएं खारिज कर दीं.

कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?

21 जून को री-NEET परीक्षा आयोजित की गई थी. इससे पहले NEET पेपर लीक को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन चल रहे थे. छात्र संगठन लगातार परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे थे और NTA की कार्यप्रणाली भी जांच के घेरे में थी. इसी बीच 16 जुलाई को री-NEET का परिणाम घोषित हुआ.

रिजल्ट आने के बाद चार छात्रों ने दावा किया कि परीक्षा अच्छी होने के बावजूद उन्हें उम्मीद से बहुत कम अंक मिले. उनका कहना था कि पहले दिखाई गई OMR शीट के आधार पर उनके 500 से अधिक अंक बन रहे थे, लेकिन अंतिम स्कोरकार्ड में 45 से 90 अंक के बीच परिणाम दिखाया गया. छात्रों ने आरोप लगाया कि मूल्यांकन के दौरान उनकी OMR बदल दी गई.

हाई कोर्ट में क्या हुआ?

छत्रपति संभाजीनगर, बीड और धुले के चार छात्रों ने इन आरोपों के आधार पर हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उनका कहना था कि NTA ने गलत मूल्यांकन किया और उन्हें वास्तविक अंक नहीं दिए. यदि यह दावा सही साबित होता, तो इसका असर सिर्फ चार छात्रों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो सकते थे.

सुनवाई के दौरान अदालत ने केवल आरोपों पर भरोसा करने के बजाय NTA से मूल रिकॉर्ड मंगवाया. सीलबंद लिफाफे में पेश की गई मूल OMR शीट, उत्तर-पत्रिकाओं और स्कोरकार्ड की जांच की गई. अदालत ने पाया कि NTA के रिकॉर्ड और घोषित परिणाम आपस में मेल खाते हैं.

इसके बाद अदालत ने छात्रों की ओर से याचिका के साथ लगाए गए दस्तावेजों की भी जांच की. यहीं मामले ने नया मोड़ लिया. अदालत के सामने प्रस्तुत दस्तावेज मूल रिकॉर्ड से मेल नहीं खाए. इससे यह सवाल खड़ा हुआ कि याचिका के साथ ऐसे दस्तावेज अदालत तक पहुंचे कैसे, जिनकी पुष्टि आधिकारिक रिकॉर्ड से नहीं हो रही थी.

कोर्ट का फैसला

30 जुलाई को बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि रिकॉर्ड के आधार पर परिणाम में किसी तरह की छेड़छाड़ साबित नहीं होती. अदालत ने चारों याचिकाएं खारिज कर दीं. सुनवाई के दौरान छात्रों ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए माफी भी मांगी. कोर्ट ने छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए कठोर कार्रवाई नहीं की और प्रत्येक पर पांच-पांच हजार रुपये का जुर्माना लगाया.


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फैसले के बाद भी बने रहे सवाल

अदालत ने परिणाम को सही माना, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कई चर्चाओं को जन्म दिया. तीन अलग-अलग जिलों के छात्रों द्वारा लगभग एक जैसे आरोप लगाए गए और याचिका के साथ ऐसे दस्तावेज लगाए गए जो मूल रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते थे. ऐसे में यह सवाल उठने लगे कि क्या यह केवल गलतफहमी थी या किसी की सलाह पर कानूनी लड़ाई लड़ी गई. हालांकि अदालत ने इन संभावनाओं पर कोई टिप्पणी नहीं की और केवल उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर फैसला सुनाया.

-भारत एक्सप्रेस



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