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तस्वीरें सिर्फ सच नहीं दिखातीं, विश्व फोटोग्राफी दिवस पर जानिए देखने का असली नजरिया

विश्व फोटोग्राफी दिवस पर जॉन बर्जर की चर्चित किताब ‘देखने के तरीक़े’ हमें तस्वीरों को सिर्फ देखने नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे नजरिए और अर्थ को समझने की सीख देती है.

हर साल 19 अगस्त को विश्व फोटोग्राफी दिवस मनाया जाता है. यह दिन कैमरे और तस्वीरों की दुनिया को याद करने का मौका तो है ही, साथ ही यह सोचने का भी अवसर देता है कि आखिर हम किसी तस्वीर को देखते कैसे हैं. क्या तस्वीर वही दिखाती है जो सामने हुआ था, या उसके पीछे भी कोई नजरिया, कहानी और सोच छिपी होती है? इन सवालों को समझने के लिए जॉन बर्जर की चर्चित किताब ‘देखने के तरीक़े’ (Ways of Seeing) आज भी बेहद प्रासंगिक लगती है.

आशीष मिश्र के हिंदी अनुवाद के जरिए यह किताब हिंदी पाठकों तक पहुंची है. पहली नजर में यह कला और तस्वीरों पर लिखी किताब लग सकती है, लेकिन बर्जर इससे कहीं बड़ी बात करते हैं. वह हमें अपने आसपास की दुनिया को सिर्फ देखने के बजाय उसे समझने की आदत डालने की कोशिश करते हैं.

बर्जर किताब की शुरुआत ही एक बेहद सहज लेकिन गहरी बात से करते हैं. हमारी दुनिया को समझने की शुरुआत देखने से होती है. एक बच्चा बोलना सीखने से पहले अपने आसपास की चीजों को देखता है, पहचानता है और उनके बीच फर्क करना शुरू करता है.

यानी देखने का अनुभव भाषा से भी पुराना है. हम पहले दुनिया को अपनी आंखों से महसूस करते हैं और बाद में उसे शब्दों में समझाने की कोशिश करते हैं. लेकिन यहां एक दिलचस्प बात सामने आती है. हम जो देखते हैं, उसे शब्दों में पूरी तरह बता पाना हमेशा संभव नहीं होता.

यही वजह है कि किसी तस्वीर को देखने का अनुभव हर व्यक्ति के लिए एक जैसा नहीं होता. एक ही तस्वीर दो लोगों को दिखाई जा सकती है, लेकिन दोनों उसमें अलग-अलग अर्थ खोज सकते हैं.

आंख जो देखती है और दिमाग जो जानता है

बर्जर के विचारों की खासियत यह है कि वह देखने और जानने के बीच के फर्क पर ध्यान दिलाते हैं. मसलन, हम रोज सूरज को उगते और डूबते हुए देखते हैं. आंखों के सामने दृश्य बिल्कुल साफ होता है. लेकिन हम यह भी जानते हैं कि वास्तव में पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है.

तो फिर हमारी आंखें जो देख रही हैं और हमारा ज्ञान जो बता रहा है, उनमें अंतर क्यों है?

यही अंतर तस्वीरों और कला को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है. किसी फोटो में दिखाई देने वाली चीज वास्तविक घटना का एक हिस्सा होती है. कैमरा पूरे संसार को नहीं, बल्कि किसी खास पल, जगह और कोण को दर्ज करता है. इसलिए तस्वीर को सिर्फ ‘सच का रिकॉर्ड’ मान लेना हमेशा सही नहीं होता.

तस्वीर कभी सिर्फ तस्वीर नहीं होती

फोटोग्राफी की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह किसी पल को रोक देती है. लेकिन उस रुके हुए पल का मतलब देखने वाला व्यक्ति अपने अनुभव के आधार पर निकालता है.

किसी सड़क पर खड़े व्यक्ति की तस्वीर किसी के लिए संघर्ष की कहानी हो सकती है, तो किसी दूसरे के लिए सामान्य जिंदगी का दृश्य. किसी पुराने घर की तस्वीर किसी को इतिहास याद दिला सकती है, जबकि कोई दूसरा उसमें सिर्फ वास्तुकला देख सकता है.

बर्जर का नजरिया हमें यही समझने में मदद करता है कि तस्वीर अपने आप में पूरी कहानी नहीं बताती. उसके पीछे फोटोग्राफर की नजर, तस्वीर लेने का समय, जगह और परिस्थिति भी मायने रखती है.

कला से लेकर विज्ञापन तक

‘देखने के तरीक़े’ की खास बात यह भी है कि बर्जर कला को सिर्फ सुंदर चीजों के संग्रह की तरह नहीं देखते. 1972 में बीबीसी की टेलीविजन श्रृंखला के रूप में सामने आया यह काम कला, समाज और सत्ता के रिश्तों पर भी सवाल उठाता है.

वह बताते हैं कि चित्रों और दूसरी छवियों को देखने का हमारा तरीका समाज से प्रभावित होता है. किस चीज को मूल्यवान माना जाए, किसे दिखाया जाए और किस नजर से दिखाया जाए—इन सबके पीछे सामाजिक और आर्थिक ताकतें काम कर सकती हैं.

आज विज्ञापन की दुनिया को देखें तो यह बात और साफ समझ आती है. विज्ञापन सिर्फ कोई उत्पाद नहीं दिखाता. वह हमारे सामने एक खास तरह की जिंदगी की तस्वीर भी रखता है. सुंदरता कैसी होनी चाहिए, सफलता कैसी दिखनी चाहिए और खुशहाल जीवन का मतलब क्या है इन सवालों के जवाब भी तस्वीरों के जरिए हमारे सामने लगातार रखे जाते हैं.

सोशल मीडिया के दौर में और ज्यादा जरूरी

बर्जर की किताब 1970 के दशक में आई थी, लेकिन आज के मोबाइल और सोशल मीडिया के दौर में उसके सवाल पहले से ज्यादा जरूरी दिखाई देते हैं.

आज हम सुबह उठने से लेकर रात तक हजारों तस्वीरों के बीच रहते हैं. फोन का कैमरा हर समय हमारे हाथ में है. लोग अपनी जिंदगी के छोटे-बड़े पल तस्वीरों और वीडियो के जरिए साझा करते हैं. दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर हमें हर दिन ऐसी छवियां दिखाई जाती हैं जो हमारे पसंद, फैसलों और इच्छाओं को प्रभावित करती हैं.

ऐसे माहौल में यह समझना जरूरी है कि हर तस्वीर सिर्फ सूचना नहीं होती. उसके पीछे किसी का चुनाव भी होता है—क्या दिखाना है, क्या छिपाना है, किस पल को चुनना है और किस तरह उसे पेश करना है.

शायद इसी वजह से विश्व फोटोग्राफी दिवस सिर्फ कैमरे और बेहतरीन तस्वीरों की चर्चा करने का दिन नहीं है. यह अपने देखने के तरीके पर भी सवाल उठाने का मौका है.

जॉन बर्जर की ‘देखने के तरीक़े’ हमें बेहतर फोटोग्राफर बनने से पहले बेहतर दर्शक बनने की चुनौती देती है. वह हमें याद दिलाती है कि देखना कोई बिल्कुल निष्क्रिय काम नहीं है. हमारी अपनी सोच, अनुभव, सामाजिक स्थिति और इच्छाएं इस बात को प्रभावित करती हैं कि हम किसी तस्वीर में क्या देखते हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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