13 अप्रैल 1984 को भारतीय सेना ने विश्व के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र कराकोरम पर्वत श्रृंखला (कश्मीर) में स्थित सियाचिन ग्लेशियर पर कब्जा करने के लिए एक साहसिक और ऐतिहासिक सैन्य अभियान शुरू किया.
विवाद की पृष्ठभूमि
सियाचिन विवाद की जड़ें 1949 के कराची समझौते में निहित हैं. भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम रेखा (Line of Control) की सीमा NJ9842 बिंदु के आगे स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं की गई थी, जिससे सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र विवादित रह गया.
पाकिस्तान ने इस क्षेत्र में विदेशी पर्वतारोहण अभियानों को अपने तरफ से परमिट जारी करके अनुमति देना शुरू कर दिया, जिसे भारत ने ग्लेशियर पर दावा जमाने की कोशिश मानते हुए देखा. इस चुनौती का सामना करने और पाकिस्तान को रणनीतिक ऊंचाइयों पर कब्जा करने से रोकने के लिए भारत ने पहले कार्रवाई करने का फैसला किया.
ऑपरेशन की शुरुआत
13 अप्रैल 1984 को भारतीय सेना के कुमार रेजिमेंट और अन्य इकाइयों के लगभग 300 भारतीय सैनिकों ने, जो उच्च ऊंचाई वाले युद्ध के लिए विशेष प्रशिक्षित थे, हेलीकॉप्टरों द्वारा सियाचिन ग्लेशियर के महत्वपूर्ण दर्रों और चोटियों पर उतारा गया.
सैनिकों ने सिया ला, बिलाफोंड ला और ग्योंग ला जैसे प्रमुख दर्रों पर सफलतापूर्वक कब्जा कर लिया. इस पूर्व-नियोजित कार्रवाई ने भारत को निर्णायक रणनीतिक लाभ प्रदान किया.
अभियान का महत्व
- ऑपरेशन मेघदूत (कालिदास की साहित्य से प्रेरित ‘दिव्य मेघदूत’ पर आधारित नाम) उच्च ऊंचाई वाले युद्ध का एक अनुपम उदाहरण माना जाता है.
- यह दुनिया में पहली बार था जब सैनिकों को इतनी ऊंची जगह (लगभग 6,700 मीटर / 22,000 फीट) पर तैनात किया गया और लड़ाई लड़ी गई.
- इस अभियान के माध्यम से भारतीय सेना ने लगभग 70 किलोमीटर लंबे मुख्य सियाचिन ग्लेशियर तथा इससे जुड़े छोटे ग्लेशियरों और तीन प्रमुख दर्रों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया.
वर्तमान स्थिति
आज भी भारतीय सेना सियाचिन ग्लेशियर पर मजबूत उपस्थिति बनाए हुए है. भारतीय जवान पूरे 70 किलोमीटर लंबे ग्लेशियर और सिया ला, बिलाफोंड ला तथा ग्योंग ला- इन तीन महत्वपूर्ण दर्रों पर नियंत्रण रखते हैं. इस नियंत्रण से भारत को गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र की ओर निगरानी रखने और पाकिस्तान की किसी भी आश्चर्यजनक कार्रवाई को रोकने में बड़ी रणनीतिक बढ़त मिली है.
रणनीतिक महत्व
सियाचिन भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थान है. ऊंचाइयों पर कब्जा करके भारत ने न केवल अपनी उत्तरी सीमाओं को सुरक्षित किया, बल्कि एक बड़ी सैन्य एवं राजनीतिक जीत हासिल की. यह अभियान भारत की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने के दृढ़ संकल्प का प्रमाण है- वो भी पृथ्वी के सबसे प्रतिकूल और कठिन इलाके में.
चार दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी भारतीय सैनिक ‘दुनिया की छत’ पर अत्यंत साहस और समर्पण के साथ ड्यूटी निभा रहे हैं, जहां तापमान -50°C से भी नीचे चला जाता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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