केरल के पलक्कड़ में रहने वाले पी. बी. मेनन की कहानी उन लोगों के लिए खास है, जो मानते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ काम करने की क्षमता और जुनून भी कम हो जाता है. 100 साल की उम्र में भी मेनन अदालत पहुंचते हैं, अपने मुवक्किलों के मामलों की पैरवी करते हैं और कानून की बारीकियों पर उतनी ही गंभीरता से काम करते हैं. वकालत के प्रति उनका यही लगाव उन्हें दूसरे वकीलों से अलग बनाता है.
पी. बालासुब्रमण्यन मेनन के नाम से पहचाने जाने वाले पी. बी. मेनन का जन्म 15 अक्टूबर 1926 को हुआ था. आज उनकी उम्र 100 साल हो चुकी है, लेकिन उन्होंने अब तक वकालत से दूरी नहीं बनाई है. उनके लिए यह पेशा केवल रोजी-रोटी कमाने का जरिया नहीं, बल्कि जिंदगी का अहम हिस्सा है.
1950 में शुरू हुआ था वकालत का सफर
मेनन ने मद्रास लॉ कॉलेज, जिसे अब डॉ. अंबेडकर गवर्नमेंट लॉ कॉलेज के नाम से जाना जाता है, से कानून की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद 18 जुलाई 1950 को उन्होंने स्वतंत्र रूप से वकालत शुरू की.
करियर के शुरुआती दिनों में उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट में एडवोकेट जनरल कुट्टिकृष्णन मेनन के अधीन काम करके अनुभव हासिल किया. करीब दो साल बाद वह पलक्कड़ लौट आए. यहां उन्होंने क्रिमिनल लॉयर के. एस. रामकृष्ण अय्यर के साथ काम करना शुरू किया.
शुरुआत में उनका काम आपराधिक मामलों से जुड़ा था, लेकिन एक जज की सलाह ने उनके करियर की दिशा बदल दी. जज ने उन्हें सिविल मामलों पर ध्यान देने की सलाह दी. मेनन ने इस सुझाव को गंभीरता से लिया और धीरे-धीरे सिविल कानून में अपनी मजबूत पहचान बना ली. यही क्षेत्र आगे चलकर उनकी विशेषज्ञता का सबसे बड़ा आधार बना.
साल 1950 से शुरू हुआ उनका सफर आज भी जारी है. सात दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद अदालत में उनकी सक्रियता यह दिखाती है कि उन्होंने अपने पेशे को कितनी गंभीरता से लिया है.
गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज है नाम
पी. बी. मेनन की उपलब्धियां सिर्फ उनके लंबे अनुभव तक सीमित नहीं हैं. साल 2023 में, 97 साल की उम्र में, उनका नाम गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया था. उस समय उन्होंने 73 साल और 60 दिनों तक वकालत करने का रिकॉर्ड बनाया था.
इससे पहले यह रिकॉर्ड जिब्राल्टर के वकील लुईस ट्राय के नाम था, जिन्होंने 70 साल और 311 दिनों तक वकालत की थी. मेनन ने इस रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया और लगातार काम करते हुए अपनी पहचान दुनिया भर में बना ली.
खास बात यह है कि रिकॉर्ड बनाने के बाद भी उन्होंने अदालत जाना बंद नहीं किया. वह आज भी जिला अदालतों में सिविल मामलों की पैरवी करते हैं. आमतौर पर लोग इस उम्र में काम से पूरी तरह दूरी बना लेते हैं, लेकिन मेनन के लिए अदालत की राह अब भी उतनी ही अहम है.
केरल हाई कोर्ट ने दिया सीनियर एडवोकेट का दर्जा
मेनन के लंबे अनुभव और वकालत के प्रति समर्पण को देखते हुए केरल हाई कोर्ट ने उन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा दिया है. यह सम्मान 12 अक्टूबर 2026 से प्रभावी हुआ है.
बताया जा रहा है कि जिला स्तर की अदालतों यानी मफस्सिल कोर्ट में नियमित रूप से प्रैक्टिस करने वाले किसी वकील को यह दर्जा पहली बार दिया गया है. इस फैसले को उन वकीलों के लिए भी अहम माना जा रहा है, जो बड़े शहरों या उच्च न्यायालयों के बजाय जिला अदालतों में रहकर लोगों को कानूनी सहायता देते हैं.
पूर्व जज वी. जी. अरुण ने मेनन को मिले इस सम्मान को उनके अटूट समर्पण की पहचान बताया है. यह फैसला मुख्य न्यायमूर्ति सौमेन सेन की पहल पर लिया गया.
इस सम्मान के साथ मेनन की उपलब्धियों में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है. उनका सफर यह भी बताता है कि कानूनी क्षेत्र में लंबे समय तक ईमानदारी और लगन से काम करने वाले लोगों का योगदान किसी एक अदालत या शहर तक सीमित नहीं रहता.
आज भी सुबह से शुरू हो जाती है केस की तैयारी
मेनन की दिनचर्या उनके काम के प्रति लगाव को साफ दिखाती है. वह सुबह जल्दी उठते हैं और अदालत जाने से पहले अपने मामलों की तैयारी करते हैं. इसके बाद नियमित रूप से कोर्ट पहुंचते हैं और अपने मुवक्किलों की ओर से दलीलें पेश करते हैं.
उनके घर पर भी युवा वकीलों और मुवक्किलों का आना-जाना लगा रहता है. लोग उनसे सलाह लेने और कानूनी मामलों को समझने के लिए मिल सकते हैं. उनके व्यवहार और काम करने के तरीके में यह बात खास मानी जाती है कि वह किसी भी मामले को छोटा या महत्वहीन नहीं समझते.
उनका मानना है कि हर केस अपने आप में अहम होता है. किसी व्यक्ति के लिए उसका छोटा-सा विवाद भी जिंदगी का बड़ा सवाल हो सकता है. ऐसे में वकील की जिम्मेदारी है कि वह मामले को गंभीरता से सुने और पूरी तैयारी के साथ अपना पक्ष रखे.
नई पीढ़ी के वकीलों के लिए बड़ी सीख
पी. बी. मेनन की कहानी सिर्फ एक विश्व रिकॉर्ड या सम्मान की खबर नहीं है. यह उस सोच की मिसाल है, जिसमें काम के प्रति लगाव उम्र से बड़ा हो जाता है. उन्होंने अपने लंबे करियर में समय के साथ बदलते कानूनी माहौल को देखा है और लगातार अदालतों में अपनी भूमिका निभाई है.
आज जब करियर में सफलता को अक्सर पद, पैसा और प्रसिद्धि से जोड़कर देखा जाता है, तब मेनन का सफर अनुभव, अनुशासन और जिम्मेदारी की अहमियत याद दिलाता है. उनका जीवन युवा वकीलों को यह सीख देता है कि पेशे में पहचान बनाने के लिए सिर्फ शुरुआत करना काफी नहीं, बल्कि लगातार सीखते रहना और अपने काम के प्रति ईमानदार बने रहना भी जरूरी है.
केरल हाई कोर्ट की ओर से मिला सीनियर एडवोकेट का दर्जा उनके दशकों के योगदान को नई पहचान देता है. साथ ही, यह जिला अदालतों में काम करने वाले उन तमाम वकीलों के लिए भी सम्मान की बात है, जो हर दिन आम लोगों को न्याय दिलाने की कोशिश करते हैं.
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