अयोध्या के राम मंदिर से जुड़ी हालिया कथित अनियमितताओं और चोरी की खबरों ने देश में एक बार फिर मंदिरों के प्रबंधन और सरकारी निगरानी को लेकर बहस तेज कर दी है. अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या बड़े और ऐतिहासिक मंदिरों की व्यवस्था पूरी तरह धार्मिक संस्थाओं के हाथ में रहनी चाहिए या फिर पारदर्शिता और सुरक्षा के लिए सरकार की भूमिका जरूरी है.
ऐसा ही एक मामला करीब चार दशक पहले वाराणसी के प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर में सामने आया था. साल 1983 में मंदिर से सोने का शिवलिंग आधार यानी स्वर्ण अर्घा चोरी हो गया था. इस घटना ने सिर्फ सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल नहीं खड़े किए, बल्कि मंदिर के पूरे प्रबंधन ढांचे को ही बदल दिया.
1983 की चोरी जिसने बदल दी मंदिर व्यवस्था
4 जनवरी 1983 की रात काशी विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह से करीब 2.6 किलोग्राम वजन का सोने का अर्घा चोरी हो गया. घटना की खबर फैलते ही उत्तर प्रदेश सरकार और पुलिस प्रशासन हरकत में आ गया. उस समय राज्य के मुख्यमंत्री श्रीपति मिश्र थे.
मामले की जांच तेज कर दी गई. तत्कालीन पुलिस महानिदेशक श्रीराम चंद्र दीक्षित के नेतृत्व में जांच आगे बढ़ी और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया. पुलिस ने 11 आरोपियों को पकड़ा और चोरी की गई कुछ संपत्ति बरामद करने का दावा भी किया.
हालांकि, इस घटना के बाद असली चर्चा सिर्फ चोरी तक सीमित नहीं रही. लोगों ने मंदिर की सुरक्षा और प्रबंधन व्यवस्था पर सवाल उठाने शुरू कर दिए. सदियों से चली आ रही व्यवस्था, जिसमें मंदिर का संचालन महंतों और परंपरागत धार्मिक अधिकारियों के हाथ में था, उसकी समीक्षा की मांग बढ़ने लगी.
सरकार ने क्यों और कैसे संभाली व्यवस्था?
चोरी की घटना के कुछ ही हफ्तों बाद 28 जनवरी 1983 को उत्तर प्रदेश सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया. इसके जरिए काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रबंधन की जिम्मेदारी एक सरकारी गठित ट्रस्ट को सौंप दी गई.
इस ट्रस्ट में धार्मिक क्षेत्र से जुड़े लोगों के साथ-साथ सरकारी अधिकारियों को भी शामिल किया गया. इसके बाद विधानसभा में कानून लाया गया. सितंबर 1983 में पेश किया गया विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद अक्टूबर 1983 में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर अधिनियम, 1983 के रूप में लागू हुआ.
इस कानून के बाद मंदिर की आय, संपत्ति और रोजमर्रा के संचालन की जिम्मेदारी ट्रस्ट के पास आ गई. मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं में भी सुधार किया गया. साफ-सफाई, बिजली व्यवस्था, सुरक्षा इंतजाम और दान की रकम के इस्तेमाल को लेकर ज्यादा व्यवस्थित प्रक्रिया बनाई गई.
आज फिर क्यों हो रही है इसकी चर्चा?
राम मंदिर से जुड़ी घटनाओं के बाद कई लोग काशी विश्वनाथ मॉडल का उदाहरण दे रहे हैं. उनका कहना है कि जिन मंदिरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और करोड़ों-अरबों रुपये का चढ़ावा आता है, वहां मजबूत निगरानी और जवाबदेही जरूरी है.
समर्थकों का तर्क है कि पारदर्शी व्यवस्था से मंदिर की संपत्ति की सुरक्षा बेहतर हो सकती है और भक्तों का भरोसा बना रहता है.
हालांकि, दूसरी तरफ कई संत, धार्मिक नेता और संगठन सरकारी नियंत्रण का विरोध करते हैं. उनका कहना है कि मंदिरों का संचालन धार्मिक समुदायों की जिम्मेदारी होनी चाहिए और सरकारी दखल धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है.
काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास बताता है कि किसी बड़े धार्मिक स्थल में हुई गंभीर घटना कई बार पूरे प्रबंधन ढांचे को बदल देती है. 1983 की चोरी ने जहां सुरक्षा और प्रशासन को लेकर नए सवाल खड़े किए, वहीं इसके बाद मंदिर व्यवस्था में कई बदलाव भी हुए.
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-भारत एक्सप्रेस
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