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सिर्फ चेतावनी नहीं, अब एक्शन चाहिए; दक्षिण एशिया में जानलेवा बनती गर्मी से निपटने के लिए भारत समेत 4 देश आए साथ

दक्षिण एशिया में बढ़ती गर्मी के बीच भारत, नेपाल, बांग्लादेश और भूटान ने हीटवेव और उससे जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने की दिशा में कदम उठाया है.

दक्षिण एशिया में गर्मी अब सिर्फ कुछ दिनों की लू या गर्मियों की सामान्य परेशानी नहीं रह गई है. तापमान बढ़ने के साथ इसका असर लोगों की सेहत, कामकाज और रोजमर्रा की जिंदगी पर भी साफ दिखाई देने लगा है. इसी बढ़ते खतरे के बीच भारत, नेपाल, बांग्लादेश और भूटान ने गर्मी से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों से निपटने के लिए मिलकर काम करने की दिशा में कदम बढ़ाया है.

प्रशांत महासागर में मजबूत हो रहा असामान्य अल नीनो इस चिंता को और बढ़ा रहा है. आशंका है कि इसका असर दक्षिण एशिया के मौसम पर भी पड़ सकता है और आने वाला गर्मी का मौसम चुनौतीपूर्ण हो सकता है.

इसी संदर्भ में ग्लोबल हीट फोरम में चारों देशों के लिए पहली बार अलग-अलग कंट्री ब्रीफ जारी की गई हैं. इन्हें ग्लोबल हीट हेल्थ इंफॉर्मेशन नेटवर्क (GHHIN) के साउथ एशिया हब ने तैयार किया है. इस हब की मेजबानी नई दिल्ली स्थित काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) कर रहा है. इसके साथ कई क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी जुड़ी हैं.

आकलन में सामने आया है कि चारों देशों ने गर्मी के खतरे को लेकर पिछले कुछ वर्षों में तैयारी तेज की है. हीट एक्शन प्लान बनाना, मौसम का पूर्वानुमान जारी करना और लोगों को पहले से चेतावनी देना जैसे कदम तेजी से आगे बढ़े हैं.

लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल चेतावनी जारी कर देना काफी नहीं है. जरूरत इस बात की है कि चेतावनी मिलते ही अस्पताल तैयार हों, स्थानीय प्रशासन सक्रिय हो, श्रमिकों की सुरक्षा के इंतजाम हों और सबसे ज्यादा जोखिम वाले लोगों तक समय पर मदद पहुंचे.

इसके लिए स्वास्थ्य व्यवस्था, शहरी नियोजन, श्रम नीतियों और स्थानीय बजट में गर्मी के जोखिम को शामिल करना जरूरी होगा. यही वह हिस्सा है जहां अभी चारों देशों में काफी अंतर दिखाई देता है.

भारत में 250 से ज्यादा हीट एक्शन प्लान

भारत में गर्मी का खतरा कितना बढ़ चुका है, इसका अंदाजा CEEW के जिला-स्तरीय अध्ययन से लगाया जा सकता है. इसके मुताबिक देश के 57 फीसदी जिले पहले ही गर्मी के उच्च से बहुत उच्च जोखिम की श्रेणी में हैं. इन जिलों में देश की करीब तीन-चौथाई आबादी रहती है.

भारत ने इस दिशा में कई स्तरों पर तैयारी की है. 250 से अधिक शहरों और जिलों में हीट एक्शन प्लान लागू किए जा चुके हैं. लू को आपदा जोखिम प्रबंधन कोष के तहत अधिसूचित प्राकृतिक आपदा के रूप में भी मान्यता मिली है.

इसके अलावा गर्मी से जुड़ी बीमारियों की निगरानी के लिए राष्ट्रीय व्यवस्था बनाई गई है और 18 हजार से ज्यादा मेडिकल अधिकारियों को इससे निपटने के लिए प्रशिक्षण दिया गया है.

अब चुनौती यह है कि इन प्रयासों को केवल आपदा के समय की प्रतिक्रिया तक सीमित न रखा जाए. गर्मी से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर अलग वित्तीय संसाधन उपलब्ध हों और हर योजना में लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर को प्रमुखता दी जाए.

नेपाल में 40 डिग्री से ऊपर के 50 दिन

हिमालयी देश नेपाल के लिए भी गर्मी का बढ़ता असर एक नई चुनौती बन रहा है. देश के दक्षिणी तराई क्षेत्र में 2024 के दौरान करीब 50 दिन तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहा.

नेपाल ने इसके जवाब में अपनी पहली संघीय हीट योजना तैयार की है. इसके साथ अलग-अलग स्तर के हीट अलर्ट की व्यवस्था भी शुरू की गई है.

हालांकि, स्वास्थ्य क्षेत्र में अभी गर्मी से जुड़ी बीमारियों का आंकड़ा व्यवस्थित तरीके से दर्ज नहीं किया जाता. विशेषज्ञों का सुझाव है कि शुरुआत तराई क्षेत्र के अस्पतालों से की जा सकती है, जहां गर्मी के कारण भर्ती होने वाले मरीजों का रिकॉर्ड अनिवार्य रूप से रखा जाए.

साथ ही मौसम और जल विज्ञान विभाग से मिलने वाली चेतावनियों को स्थानीय प्रशासन और आम लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत बताई गई है.

बांग्लादेश में उमस भरी गर्मी बनी बड़ी चिंता

बांग्लादेश में गर्मी का असर सिर्फ थर्मामीटर के तापमान से नहीं समझा जा सकता. वहां तापमान के साथ नमी भी काफी अधिक रहती है, जिससे शरीर पर पड़ने वाला असर और बढ़ जाता है.

विश्व बैंक के अनुसार, 1980 के बाद से देश में महसूस होने वाले तापमान में करीब 4.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोतरी हुई है. अब साल का लगभग एक-तिहाई हिस्सा खतरनाक उमस वाली गर्मी की स्थिति में गुजरता है.

बांग्लादेश ने अपनी राष्ट्रीय अनुकूलन योजना में गर्मी को शामिल किया है. नारायणगंज में देश का पहला शहरी हीट एक्शन प्लान भी तैयार किया गया है. इसके अलावा गर्मी से जुड़ी बीमारियों को लेकर राष्ट्रीय दिशानिर्देश और ‘B.E.A.T. the Heat’ नाम से जन-जागरूकता अभियान शुरू किया गया है.

अब जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रीय और स्थानीय स्तर पर अलग-अलग हीट एक्शन प्लान तैयार हों. साथ ही मौसम विभाग से मिलने वाले पूर्वानुमान को अस्पतालों की स्वास्थ्य निगरानी व्यवस्था से जोड़ा जाए, ताकि खतरे का अंदाजा पहले लग सके और इलाज की तैयारी समय रहते की जा सके.

भूटान में बदल रहा ठंडे इलाकों का मौसम

भूटान को लंबे समय तक अपेक्षाकृत ठंडे मौसम वाले देश के तौर पर देखा जाता रहा है. लेकिन अब देश के दक्षिणी और निचले इलाकों में बढ़ती गर्मी वहां के लोगों के लिए नया जोखिम पैदा कर रही है.

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जिन समुदायों को पहले भीषण गर्मी से बचाव की खास जरूरत नहीं पड़ती थी, उन्हें अब बदलती परिस्थितियों के अनुसार तैयारी करनी होगी.

भूटान में गर्मी से जुड़ी जिम्मेदारियां स्वास्थ्य मंत्रालय को दी जा चुकी हैं. 2022 के एक नियम के तहत श्रमिकों को गर्मी से सुरक्षा देना भी जरूरी किया गया है.

देश के पास बाढ़ और ग्लेशियर झीलों से जुड़ी मजबूत पूर्व चेतावनी प्रणालियां हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि इसी अनुभव का इस्तेमाल गर्मी से जुड़ी चेतावनी और कार्रवाई के लिए किया जा सकता है. साथ ही मौजूदा अलग-अलग निर्देशों को जोड़कर एक व्यापक राष्ट्रीय हीट एक्शन प्लान बनाने का सुझाव दिया गया है.

सिर्फ चेतावनी नहीं, चेतावनी के बाद कार्रवाई जरूरी

GHHIN साउथ एशिया हब के अध्यक्ष और CEEW के फेलो डॉ. विश्वास चितले के मुताबिक, दक्षिण एशिया में अत्यधिक गर्मी अब पूरे साल बना रहने वाला क्षेत्रीय जोखिम बनती जा रही है. उनका कहना है कि चारों देश इस चुनौती से निपटने के लिए पहले ही कई कदम उठा चुके हैं, लेकिन अब मौसम के पूर्वानुमान को स्वास्थ्य व्यवस्था, स्थानीय बजट और श्रम नियमों से जोड़ने की जरूरत है.

यानी किसी इलाके में हीट अलर्ट जारी होने के बाद यह साफ होना चाहिए कि किस विभाग को क्या करना है, अस्पतालों को कितनी तैयारी करनी है और जोखिम वाले लोगों तक सहायता कैसे पहुंचानी है.

BRAC JPGSPH की डॉ. फरजाना मीशा ने भी गर्मी को स्वास्थ्य के ऐसे खतरे के तौर पर रेखांकित किया जिसे अक्सर बाढ़ या चक्रवात की तुलना में कम गंभीरता से देखा जाता है. जबकि लंबे समय तक पड़ने वाली गर्मी लोगों की सेहत के साथ-साथ काम करने की क्षमता और खाद्य सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकती है.

चारों देशों के बीच सहयोग पर जोर

विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण एशिया में गर्मी की समस्या किसी एक देश तक सीमित नहीं है. मौसम सीमाओं को नहीं मानता, इसलिए इससे निपटने की तैयारी भी केवल राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए.

UNESCAP की ओर से साझा पूर्व चेतावनी प्रणालियों, समान तापमान मानकों और सीमा-पार सहयोग जैसे उपायों पर जोर दिया गया है. भविष्य में एक देश के मौसम पूर्वानुमान और अनुभव दूसरे देशों के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं.

GHHIN साउथ एशिया हब अब चारों देशों के संस्थानों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का क्षेत्रीय नेटवर्क तैयार करने की दिशा में काम करेगा. इसका उद्देश्य गर्मी से जुड़े वैज्ञानिक आंकड़ों और पूर्वानुमानों को ऐसी व्यावहारिक कार्रवाई में बदलना है, जिससे सबसे ज्यादा जोखिम झेल रहे समुदायों को समय रहते सुरक्षा मिल सके.

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-भारत एक्सप्रेस



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