आज भारत की स्वतंत्रता संग्राम की एक अनमोल नायिका, सरस्वती राजमणि की पुण्यतिथि है. सरस्वती राजमणि को भारत की पहली महिला जासूस के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने मात्र 16 वर्ष की उम्र में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ खुफिया युद्ध में हिस्सा लिया.
नेताजी से मुलाकात
सरस्वती राजमणि (जन्म: 11 जनवरी 1927) का जन्म बर्मा (वर्तमान म्यांमार) के रंगून में एक धनी तमिल परिवार में हुआ था. उनके पिता एक स्वर्ण खान के मालिक थे और परिवार गांधीजी के अहिंसक मार्ग का समर्थन करता था. लेकिन छोटी उम्र से ही सरस्वती को लगा कि भारत की आजादी के लिए बल प्रयोग भी आवश्यक है. मात्र 10 वर्ष की उम्र में वे बंदूक से खेलती और शूटिंग का अभ्यास करती दिखाई देती थीं.
1940 के दशक में जब सुभाष चंद्र बोस (नेताजी) दक्षिण-पूर्व एशिया में आज़ाद हिंद फौज का गठन कर रहे थे, तब सरस्वती ने नेताजी की एक सभा में भाग लिया. उनकी देशभक्ति से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी सारी जेवरात नेताजी को सौंप दिए. उनकी इस निस्वार्थ भावना से प्रभावित होकर नेताजी ने उन्हें “सरस्वती राजमणि” नाम दिया और INA में शामिल होने का अवसर प्रदान किया.
झांसी की रानी रेजिमेंट और जासूसी की भूमिका
1942 में सरस्वती राजमणि ने INA की प्रसिद्ध झांसी की रानी रेजिमेंट में शामिल होकर प्रशिक्षण लिया. यह रेजिमेंट लक्ष्मी सहगल (कैप्टन लक्ष्मी) के नेतृत्व में गठित एक पूर्ण महिला सैन्य इकाई थी, जो रानी लक्ष्मीबाई के नाम पर आधारित थी.
लेकिन उनकी असली पहचान INA की सैन्य खुफिया शाखा (military intelligence wing) में काम करने से बनी. मात्र 16 वर्ष की उम्र में वे भारत की सबसे युवा और पहली महिला जासूस बनीं. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने कई जोखिम भरे मिशन पूरे किए:
- कोलकाता में घुसपैठ: वे ब्रिटिश सैन्य अड्डे में एक साधारण मजदूर या दास के वेश में घुसीं और महत्वपूर्ण सैन्य जानकारी एकत्र की, जिसे INA तक पहुंचाया.
- नेताजी की सुरक्षा: 1943 में उन्होंने ब्रिटिशों द्वारा सुभाष चंद्र बोस की हत्या की साजिश को उजागर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
- वेश बदलकर जासूसी: कई बार वे लड़के के वेश में ब्रिटिश अधिकारियों के लिए छोटे-मोटे काम करके गोपनीय दस्तावेज और योजनाएं चुराती थीं. एक मिशन में वे नृत्यांगना बनकर एक साथी को बचाने गईं और भागते समय गोली भी लगी, लेकिन वे सफल रहीं.
उनके इन साहसिक कार्यों ने INA को ब्रिटिश योजनाओं की पूर्व जानकारी प्रदान की और स्वतंत्रता संग्राम को मजबूती दी.
युद्ध के बाद सरस्वती राजमणि चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) में बस गई. उन्होंने अपनी आत्मकथा “हार नहीं मानूंगी” लिखी, जिसमें अपनी जासूसी और INA के अनुभवों का वर्णन किया. जीवन के अंतिम वर्षों में वे स्वतंत्रता सेनानी पेंशन पर निर्भर रहीं और समाजसेवा में सक्रिय रहीं.
सरस्वती राजमणि की कहानी हमें बताती है कि स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका कितनी बहादुर और निर्णायक थी. वे न केवल झांसी की रानी रेजिमेंट की योद्धा थीं, बल्कि एक ऐसी जासूस थीं जिन्होंने उम्र और लिंग की सीमाओं को तोड़कर देश के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया.
भारत की इस बेटी को, जिसने कभी हार नहीं मानी. 13 जनवरी 2018 को चेन्नई में हृदयाघात से उनका निधन हो गया था. वह उस समय लगभग 91 वर्ष की थीं.
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-भारत एक्सप्रेस
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