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कुर्सी का मोह या संवैधानिक मजबूरी? ममता बनर्जी के इस्तीफे पर अड़ने से याद आया 1998 का कल्याण सिंह मामला

1998 में उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह और जगदंबिका पाल के बीच हुए ‘दो मुख्यमंत्री’ वाले संवैधानिक संकट की यादें अब बंगाल चुनाव 2026 के नतीजों के बाद ताजा हो गई हैं. जहां भाजपा को बहुमत मिला है और ममता बनर्जी ने इस्तीफे से इनकार किया है.

1998 UP Crisis vs Bengal 2026 Can a state have two Chief Ministers

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Edited by Vaibhav Gupta

1998 में उत्तर प्रदेश में एक अनोखा संवैधानिक संकट पैदा हुआ था. भाजपा के कल्याण सिंह मुख्यमंत्री थे. 21 फरवरी 1998 को राज्यपाल रोमेश भंडारी ने उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया. कारण ये था कि उनके सहयोगी उत्तर प्रदेश लोकतांत्रिक कांग्रेस (यूपीएलसी) के नरेश अग्रवाल का समर्थन वापस लेना. उसी रात राज्यपाल ने कांग्रेस के जगदंबिका पाल को नया मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया.

एक राज्य दो मुख्यमंत्री की स्थिति

कल्याण सिंह ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया. 23 फरवरी को हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी पर रोक लगा दी और स्टेटस को बहाल कर दिया. इससे दो-दो मुख्यमंत्री वाली अजीब स्थिति बन गई. कल्याण सिंह और जगदंबिका पाल दोनों दफ्तर में बैठे हुए थे. जगदंबिका पाल ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने 24 फरवरी 1998 को दोनों दावेदारों के बीच कॉम्पोजिट फ्लोर टेस्ट (संयुक्त विश्वास मत) कराने का आदेश दिया. 26-27 फरवरी को विधानसभा में वोटिंग हुई. कल्याण सिंह को 225 वोट मिले, जगदंबिका पाल को 196. कल्याण सिंह बहुमत साबित कर मुख्यमंत्री बने रहे. जगदंबिका पाल का कार्यकाल महज 1-3 दिन (कुछ रिपोर्ट्स में 31 घंटे) का रहा.

यह घटना राज्यपाल की भूमिका, फ्लोर टेस्ट के महत्व और न्यायपालिका की हस्तक्षेपकारी भूमिका का उदाहरण बन गई.

संवैधानिक प्रावधान: क्या दो मुख्यमंत्री संभव?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 के अनुसार:

  • राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है.
  • मुख्यमंत्री विधानसभा के बहुमत का विश्वास साबित करने वाला व्यक्ति होना चाहिए.
  • मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति जवाबदेह होती है.

संविधान में एक ही राज्य में दो मुख्यमंत्री का कोई प्रावधान नहीं है. मुख्यमंत्री पद एकल (singular) है. दो दावेदारों की स्थिति में अदालतें फ्लोर टेस्ट या अन्य संवैधानिक उपायों से फैसला करती हैं. 1998 का मामला भी इसी का उदाहरण है अंततः एक ही व्यक्ति बहुमत साबित कर पद पर रहा.

अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का भी इस्तेमाल हो सकता है अगर संवैधानिक मशीनरी चरमराती है, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में दो CM नहीं चल सकते.

ममता बनर्जी और पश्चिम बंगाल 2026: क्या होगा?

2026 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने भारी जीत हासिल की (लगभग 206-207 सीटें), जबकि तृणमूल कांग्रेस (TMC) करीब 80 सीटों पर सिमट गई. ममता बनर्जी खुद भवानीपुर से हार गईं. कई TMC मंत्री भी हार गए.

ममता ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है. लेकिन संवैधानिक रूप से मुख्यमंत्री का पद विधानसभा में बहुमत पर टिका होता है, न कि व्यक्तिगत चुनावी हार पर. 2026 में TMC स्पष्ट रूप से अल्पमत में है. भाजपा के पास बहुमत है. राज्यपाल भाजपा के सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने का निमंत्रण दे सकते हैं.

अगर ममता इस्तीफा नहीं देतीं, तो राज्यपाल फ्लोर टेस्ट का आदेश दे सकते हैं या अन्य संवैधानिक कदम उठा सकते हैं. 1998 UP की तरह यहां भी फ्लोर टेस्ट निर्णायक साबित हो सकता है. दो मुख्यमंत्री वाली स्थिति असंवैधानिक और अव्यवहारिक होगी. अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं, जैसा 1998 में हुआ.

क्या था 1998 का संकट?

1998 का UP संकट लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक बना है. अदालत ने फ्लोर टेस्ट के जरिए बहुमत का फैसला कराया. बंगाल में भी संवैधानिक प्रक्रिया यही मांग करती है: बहुमत साबित करो या रास्ता छोड़ दो. कुर्सी का मोह व्यक्तिगत हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र संस्थाओं पर चलता है. ममता अगर लंबे समय तक अड़ी रहीं, तो संकट गहरा सकता है, लेकिन अंत में संविधान और अदालत ही फैसला करेंगे.

सुप्रीम कोर्ट के Jagdambika Pal vs Union of India (1998) फैसले और संविधान के अनुच्छेद 163-164. इतिहास दोहराने की बजाय संवैधानिक मर्यादा बनाए रखना ही उचित होगा.

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-भारत एक्सप्रेस



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