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World Desertification Day: नई किताब ‘पीपल की छांव में’ खोलेगी बंजर धरती को दोबारा हरा-भरा बनाने और सूखा संकट से निपटने का अचूक मंत्र

World Desertification Day: विश्व मरुस्थलीकरण दिवस पर प्रसिद्ध पर्यावरणविद् पीपल बाबा की नई किताब ‘पीपल की छांव में’ लॉन्च हुई है. ढाई करोड़ से अधिक पेड़ लगा चुके पीपल बाबा की यह किताब बंजर धरती को हरा-भरा बनाने और सूखा संकट से निपटने का एक बड़ा संदेश देती है.

Peepal Baba book

Peepal Baba book

World Desertification Day: आज विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस (World Day to Combat Desertification and Drought) मनाया जा रहा है. इस वर्ष की थीम ‘Rangelands: Recognize. Respect. Restore.’ (चरागाहों को पहचानें, सम्मान दें, पुनर्स्थापित करें) है, जो भूमि क्षरण, सूखे और जलवायु परिवर्तन से जूझ रही दुनिया में पारंपरिक चरागाहों, वनस्पतियों और स्थानीय समुदायों की भूमिका पर जोर देती है.

इस संदर्भ में प्रसिद्ध पर्यावरणविद् पीपल बाबा (स्वामी प्रेम परिवर्तन) की नई पुस्तक ‘पीपल की छांव में – जीवन, प्रकृति और चेतना पर संवाद’ (पेंगुइन स्वदेश) अत्यंत प्रासंगिक है. यह पुस्तक न केवल एक आत्मकथा है, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंध की खोज, पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा और आध्यात्मिक जागरण का एक सुंदर मिश्रण है.

पीपल बाबा: एक जीवित किंवदंती

स्वामी प्रेम परिवर्तन, जिन्हें पीपल बाबा के नाम से जाना जाता है, का जन्म 26 जनवरी 1966 को चंडीगढ़ में हुआ. बचपन से ही प्रकृति के प्रति उनका लगाव गहरा था. उनकी अंग्रेजी शिक्षिका और दादी के प्रोत्साहन ने उन्हें पेड़ लगाने की प्रेरणा दी. 1977 से शुरू हुई यह यात्रा आज ढाई करोड़ से अधिक पेड़ (खासकर पीपल) लगाने और 2 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र को हरित बनाने तक पहुंच चुकी है. Give Me Trees Trust के माध्यम से उन्होंने 200+ जिलों और 18+ राज्यों में काम किया है.

पीपल बाबा पेड़ों को मात्र जीव नहीं, बल्कि दोस्त, शिक्षक और चेतना का प्रतीक मानते हैं. उनकी यह सोच पुस्तक में स्पष्ट झलकती है.

पुस्तक का सार

‘पीपल की छांव में’ (अंग्रेजी में Ghosts on Peepal Trees) लगभग 50 वर्षों की यात्रा का दस्तावेज है. यह 324 पृष्ठों की किताब पर्यावरण, आध्यात्मिकता और मानवीय संवेदनाओं को एक सूत्र में पिरोती है.

व्यक्तिगत संस्मरण

बचपन की कहानियां, दादी-नानी की लोक कथाएं, स्कूल-कॉलेज के अनुभव, ओशो जैसे गुरुओं से सीख और सड़क पर बिताए वर्ष. लेखक ने अपनी कलम से साझा किया है कि कैसे मिट्टी, जंगल और पेड़-पौधों ने उन्हें जीवन के सबक सिखाए.

प्रकृति का संवाद

पुस्तक में पीपल का वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि ऊर्जा, चेतना और आध्यात्मिकता का प्रतीक है. भारतीय संस्कृति में पीपल की महत्ता (जिसे ‘अशवत्थ’ कहा जाता है) को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ा गया है. लेखक पेड़ों से ‘बातचीत’ का अनुभव साझा करते हैं – जैसे वे दोस्तों की तरह हैं जो हमें शांति, धैर्य और संतुलन सिखाते हैं.

पर्यावरण संदेश

यह किताब जमीनी संघर्षों की कहानी है – सूखे, मिट्टी की बिगड़ती स्थिति, वनों की कटाई और मानव-प्रकृति के टूटते संबंध. लेकिन निराशा नहीं, बल्कि आशा और समाधान पर जोर. पीपल बाबा दिखाते हैं कि छोटे-छोटे प्रयास (एक पेड़ लगाना) कैसे बड़े परिवर्तन ला सकते हैं.

सरल और आत्मिक भाषा

पाठक समीक्षाओं में इसकी सरल भाषा, प्रकृति-प्रेम और गहरे संदेशों की सराहना की गई है. यह बच्चों से लेकर वयस्कों तक सभी के लिए आनंददायक है – एक ‘खुशी-खुशी’ लिखी गई किताब जो पढ़ने के बाद प्रकृति के साथ गहरा जुड़ाव महसूस कराती है.

पुस्तक का लोकार्पण विश्व पर्यावरण दिवस पर अरावली के जंगलों में पौधे लगाकर किया गया, जो इसके संदेश से पूरी तरह मेल खाता है.

विश्व मरुस्थलीकरण दिवस से संबंध

इस दिवस पर थीम रेंजलैंड्स (चरागाहों) की बहाली पर केंद्रित है, जो सूखा रोकथाम और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं. पीपल बाबा की पुस्तक और उनके कार्य ठीक यही करते हैं – भूमि को पुनर्स्थापित करना, वृक्षारोपण के माध्यम से मिट्टी की नमी बढ़ाना, सूखे से लड़ना और स्थानीय समुदायों को शामिल करना.

पेड़ मरुस्थलीकरण रोकते हैं

वे मिट्टी को बांधते हैं, जल चक्र बनाए रखते हैं, कार्बन सोखते हैं और सूखे में भी जीवन देते हैं. पुस्तक हमें याद दिलाती है कि ‘स्वस्थ भूमि – स्वस्थ लोग’. पीपल बाबा का संदेश है – प्रकृति का सम्मान करो, उसके साथ संवाद करो और उसे बहाल करो.

‘पीपल की छांव में’ सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि एक आंदोलन का दस्तावेज है. आज के दिवस पर यह हमें याद दिलाती है कि मरुस्थलीकरण और सूखे से लड़ाई व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर होनी चाहिए. पीपल बाबा की तरह हम भी एक पेड़ लगाकर शुरू कर सकते हैं.

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-भारत एक्सप्रेस 



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