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चीन में बंदरों की डिमांड हाई, कीमत जानकर रह जाएंगे दंग

China Lab Monkeys: चीन में बायोटेक रिसर्च की तेज़ रफ्तार ने लैब बंदरों की मांग को आसमान पर पहुंचा दिया है.

China Lab Monkeys: अगर कोई कहे कि चीन में बंदर अब करोड़ों के कारोबार का हिस्सा बन चुके हैं तो सुनकर हैरानी होगी, लेकिन यही हकीकत है. रिसर्च लैब में इस्तेमाल होने वाले मकाक बंदरों की मांग इतनी तेजी से बढ़ी है कि उनकी कीमत कोविड काल के रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गई है. एक स्वस्थ और रिसर्च के लिए तैयार बंदर की कीमत 2 लाख युआन यानी लगभग 24 से 30 लाख रुपये तक बताई जा रही है.

क्यों बढ़ी मांग?

नई दवाओं को बाजार में लाने से पहले कई चरणों से गुजरना पड़ता है. पहले लैब टेस्ट, फिर जानवरों पर प्रीक्लीनिकल ट्रायल और उसके बाद इंसानों पर क्लीनिकल ट्रायल होते हैं. रीसस और सिनोमोल्गस मकाक बंदरों का डीएनए और जैविक प्रतिक्रिया इंसानों से काफी मिलती है. इसी वजह से कैंसर, मोटापा, मधुमेह और इम्यून सिस्टम से जुड़ी दवाओं की सुरक्षा और असर जांचने के लिए इनका इस्तेमाल होता है. हालांकि हर दवा के लिए बंदर जरूरी नहीं होते, लेकिन जटिल बायोलॉजिकल और एंटीबॉडी आधारित इलाज में इनकी अहम भूमिका रहती है.

चीन का बायोटेक बूम

पिछले कुछ सालों में चीन ने बायोटेक सेक्टर में भारी निवेश किया है. 2025 में चीन में 5,215 क्लीनिकल ड्रग ट्रायल दर्ज हुए, जिनमें से करीब 57.5 प्रतिशत नई दवाओं से जुड़े थे. यह आंकड़ा 2020 के मुकाबले लगभग दोगुना है. यही वजह है कि चीन अब कैंसर, मोटापा और ऑटोइम्यून बीमारियों की दवा विकसित करने वाले प्रमुख देशों में शामिल हो गया है.

सप्लाई क्यों कम पड़ रही है?

एक लैब बंदर को रिसर्च के लिए तैयार करने में करीब चार साल लगते हैं. जन्म से लेकर पालन-पोषण, स्वास्थ्य जांच और संक्रमण मुक्त प्रमाणन तक की प्रक्रिया लंबी होती है. अचानक मांग बढ़ने पर सप्लाई तुरंत नहीं बढ़ाई जा सकती. कोविड महामारी के दौरान चीन ने बंदरों के निर्यात पर भी रोक लगाई थी, जिससे घरेलू बाजार में कमी और बढ़ गई. अब जब बायोटेक रिसर्च तेजी से बढ़ रही है तो मांग सप्लाई से कहीं आगे निकल गई है.

आंकड़े क्या कहते हैं?

2025 से 2027 के बीच चीन में हर साल लगभग 49 हजार से 52 हजार लैब बंदरों की उपलब्धता का अनुमान है. लेकिन रिसर्च की रफ्तार को देखते हुए यह संख्या पर्याप्त नहीं है. अनुमान है कि हर साल करीब 10 हजार बंदरों की कमी बनी रहेगी. कई संस्थानों को महीनों तक इंतजार करना पड़ रहा है. यही वजह है कि बंदर अब सिर्फ रिसर्च का हिस्सा नहीं, बल्कि एक महंगी जैविक संपत्ति बन चुके हैं.

क्या भविष्य में बंदरों की जरूरत घटेगी?

दुनियाभर में पशु परीक्षण कम करने की दिशा में काम हो रहा है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑर्गन-ऑन-चिप और थ्री-डी सेल कल्चर जैसी तकनीकें विकसित की जा रही हैं ताकि जानवरों पर निर्भरता घटाई जा सके. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल कई जटिल दवाओं के लिए प्राइमेट्स का विकल्प पूरी तरह उपलब्ध नहीं है. इसलिए आने वाले वर्षों तक लैब बंदरों की मांग ऊंची बनी रह सकती है.

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चीन में बंदरों की बढ़ती कीमत किसी वन्यजीव बाजार की कहानी नहीं है, बल्कि दवा उद्योग की बदलती अर्थव्यवस्था का हिस्सा है. जितनी तेजी से चीन नई दवाओं के विकास में आगे बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से रिसर्च के लिए जरूरी जैविक संसाधनों की मांग भी बढ़ रही है. आज लैब में इस्तेमाल होने वाला एक बंदर अरबों डॉलर के फार्मा उद्योग की अहम कड़ी बन चुका है.

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-भारत एक्सप्रेस



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