PM Modi China Visit SCO: चीन के तिआनजिन में आयोजित हो रहे शंघाई शिखर सम्मेलन (SCO) में भाग लेने के लिए पीएम मोदी शनिवार को चीन पहुंचे. आज 31 अगस्त दिन रविवार को पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बैठक हुई. इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी चीन पहुंचेंगे. जिनसे भी पीएम मोदी की बैठक निर्धारित है.
चीन में आयोजित हो रहे इस सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं. इसको लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप परेशान नजर आ रहे हैं. डोनाल्ड ट्रंप SCO और BRICS जैसे देशों को हमेशा से खतरा मानते रहे हैं. वो सार्वजनिक तौर पर यह कह चुके हैं कि ये संगठन अमेरिका के खिलाफ हैं. आइये जानते हैं कि आखिर SCO समिट से डोनाल्ड ट्रंप क्यों टेंशन में हैं.
दुनिया की 40% आबादी
चीन के तिआनजिन में आयोजित हो रहे शंघाई शिखर सम्मेलन में दुनिया भर के 26 देशों के राष्ट्र प्रमुख हिस्सा ले रहे हैं. इन देशों में दुनिया की 40% आबादी रहती है. भारत में 147 करोड़, चीन में 142 करोड़ और रूस 14.6 करोड़ लोग रहते हैं. यानी दुनिया का हर तीसरा शख्स इन्हीं देशों के रहने वाले हैं. वहीं अमेरिका की आबादी 34.7 करोड़ है. अगर भारत, चीन और रूस को संयुक्त रूप से मिला लें तो अमेरिका की आबादी से 9 गुना ज्यादा लोग इन देशों में रहते हैं.
31% जीडीपी वाला संगठन
GDP की बात करें तो पर्चेजिंग पावर पैरिटी (PPP) के हिसाब से दुनिया की GDP में इस संगठन का हिस्सा 31% से ज्यादा (61.3 ट्रिलियन डॉलर) है. जिसमें भारत की $16.19 ट्रिलियन, चीन की $38.19 ट्रिलियन और रूस की 6.92 ट्रिलियन डॉलर है. वहीं अमेरिका की GDP (PPP) 29.18 ट्रिलियन डॉलर है. यानी तीनों देशों की संयुक्त जीडीपी अमेरिका से दोगुनी है.
एटॉमिक पावर मामले में मीलों आगे है संगठन
इस समय कोई देश कितना ताकतवर है उसका अंदाजा उसके पास परमाणु बमों की संख्या के हिसाब से लगता है. इस मामले में भी भारत, चीन और रूस अमेरिका से मीलों आगे हैं. भारत के पास जहां 172 परमाणु बम है. तो वहीं चीन के पास 600 और रूस के पास 5580 परमाणु बम हैं. जो कि पूरी दुनिया का 51% हिस्सा बनता है.
अमेरिका के पास कुल परमाणु बमों की संख्या 5225 है. यानी तीनों देशों के परमाणु बमों को मिला लें तो ये इन देशों के पास अमेरिका से 1127 ज्यादा परमाणु बम हैं.
अगर चीन की तरफ झुका भारत तो क्या होगा?
भारत चीन और रूस के एक साथ आ जाने से अमेरिका को कई बड़े खतरों का सामना करना पड़ेगा. वैश्विक पटल पर अमेरिका का दबदबा जहां खत्म हो जाएगा. वहीं उसकी अर्थव्यवस्था को भी काफी नुकसान होगा.
प्रोडक्शन होगा महंगा
अमेरिकी कंपनियां भारत और चीन में अपने ज्यादातर प्रोडक्ट मैन्युफैक्चर करती हैं. अगर दोनों देश अमेरिका के खिलाफ एक साथ आ जाएंगे तो अमेरिकी सामानों का प्रोडक्शन महंगा हो जाएगा. आईफोन से लेकर लैपटॉप और सेमीकंडक्टर जैसी चीजों के दामों में भारी वृद्धि होगी. जिसका खामियाजा अंत में अमेरिकी जनता को भुगतना होगा.
अमेरिकी हथियारों की घट जाएगी बिक्री
भारत के चीन की तरफ झुकने से ना सिर्फ अमेरिकी अर्थव्यवस्था को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी बल्कि उसके हथियारों की बिक्री भी कम हो जाएगी. भारत जहां 2014 से अबतक खरीदे गए हथियारों में से 70% से ज्यादा अमेरिका से खरीदे हैं. इस साल अमेरिका से भारत ने F-35 फाइटर जेट खरीदने वाला था. लेकिन ट्रंप के द्वारा टैरिफ लगाने के बाद इस योजना को भारत ने ठंडे बस्ते में डाल दिया. भारत रूस से 36% हथियार खरीदता है.
इंडो-पेसिफिक में कमजोर होगा US
अमेरिका चीन को अपना दुश्मन समझता है. चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका हमेशा से भारत को आगे बढ़ाता रहा है. इसका सबसे बड़ा कारण भारत का बाजार, सैन्य क्षमताएं, चीन से भारत के सतत संघर्ष और उसकी लोकेशन है. लेकिन जब भारत चीन की तरफ झुकेगा तो इंडो-पैसिफिक में चीन का सामना करने के लिए अमेरिका के द्वारा बनाये गए भारत,जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका का संयुक्त मंच QUAD कमजोर हो जाएगा.
डॉलर का घट जाएगा दबदबा
दुनिया भर में व्यापार करेंसी के रूप में सबसे ज्यादा इस्तेमाल अमेरिकी डॉलर का किया जाता है. लेकिन BRICS देश डॉलर के बजाये लोकल करेंसी में करते हैं. भारत भी ब्रिक्स का स्थायी सदस्य है. चीन और रूस का अधिकतर (95%) व्यापार रूबल और युआन में होता है. वहीं भारत और रूस का अधिकतर व्यापार (90%) रुपये और रूबल में होता है. ब्रिक्स देश मिलकर एक कॉमन करेंसी लाने की योजना पर काम कर रहे हैं. अगर ये कोशिश कामयाब होगी तो ब्रिक्स एक अपना पेमेंट सिस्टम बना सकता है. जिसका सबसे बड़ा प्रभाव अमेरिकी डॉलर पर पड़ेगा. इससे अमेरिका का डॉलर बेस्ड पेमेंट सिस्टम कमजोर हो जाएगा और डॉलर की कीमत में भारी कमी आ जाएगी.
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वैश्विक मंचों पर अमेरिका के बंध जाएंगे हाथ
अभी रूस के द्वारा यूक्रेन पर हमले के बाद से अमेरिका ने रूस पर भारी सैंक्शन लगा रखा है. इस मामले में भारत न्यूट्रल रहा है. भारत, रूस और चीन के एक साथ आ जाने के बाद अमेरिका के द्वारा रूस पर सैंक्शन लगाना मुश्किल हो जाएगा. वैश्विक मंचों पर भी अमेरिका के द्वारा रूस के खिलाफ कोई प्रस्ताव लाना भी आसान नहीं रह पायेगा.
अमेरिकी थिंक टैंक कारनेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के विशेषज्ञ एशले टेलिस ने डोनाल्ड ट्रंप पर तंज कसते हुए कहा कि, ट्रंप ही असली शांतिदूत निकले. उन्होंने अपने मनमाने फैसलों से भारत को चीन के करीब ला दिया. उन्होंने भारत जैसे मित्र देश के साथ दुश्मनों जैसा व्यवहार कर विश्वासघात किया है.
पीएम मोदी के चीन दौरे को लेकर एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीन का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर दबदबा है. रूस का एनर्जी सेक्टर पर और भारत के पास सर्विस सेक्टर बेस्ड इकोनॉमी और बड़ा बाजार है. अगर ये तीनों मिल गए तो ना सिर्फ ट्रेड बल्कि पूरी दुनिया की जियोपॉलिटिक्स बदल जाएगी. दुनिया सिंगलपोलर नहीं बल्कि मल्टी पोलर हो जाएगी. यो अमेरिका कभी नहीं चाहता.
– भारत एक्सप्रेस
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