Donald Trump Indian Immigration Policies: अमेरिका में आने वाले प्रवासियों को लेकर डोनाल्ड ट्रंप आए दिन कोई ना कोई सख्त निर्णय ले रहे हैं. वे अवैध रूप से अमेरिका में घुसे लोगों का मास डिपोर्टेशन करवा रहे हैं. ट्रंप की कोशिश है कि अमेरिका में दूसरे देशों से कम से कम लोग आएं. डोनाल्ड ट्रंप भारतीयों के प्रति कुछ ज्यादा ही सख्ती से पेश आ रहे हैं. वे कभी वर्क वीजा H-1B पर भारी भरकम फीस लगा रहे हैं. तो कभी अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ने आए भारतीय छात्रों को लेकर ऐसे नियम बना रहे हैं जिससे पढ़ाई खत्म होने के बाद छात्र ज्यादा दिनों तक अमेरिका में टिक ना सकें.
अमेरिकी राष्ट्रपति के इस कदम का अमेरिका के ही बुद्धिजीवी विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप ऐसा करके अमेरिका को ही नुकसान पहुंचा रहे हैं. अगर ऐसे ही भारतीयों के खिलाफ ट्रंप अभियान चलाते रहे तो आने वाले दिनों में अमेरिका का वहीं हाल हो जाएगा जो युगांडा का हुआ था. आखिर युगांडा में ऐसा क्या हुआ था, जिसके बारे में सोचकर अमेरिकी बुद्धिजीवी परेशान हैं.

ईदी अमीन बना युगांडा का तानाशाह
ये जानने के लिए हमें 54 साल पीछे 1971 में जाना होगा. साल 1946 में जन्में एक अफ्रीकन सैनिक जो प्रमोशन पाकर युगांडा की सेना अफ्रीकन राइफल्स का कमांडर बन गया था, ने तख्तापलट कर देश की सत्ता पर कब्जा कर लिया. लोगों को लगा कि ईदी अमीन अफ्रीका की मूल जनजाति से ताल्लुक रखता है तो वो उनके दुख-दर्द को समझेगा. लेकिन सत्ता में बैठते ही ईदी अमीन निरंकुश हो गया. उसने अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को बंदूक के दम पर दबा दिया. अपने की विरोधियों को उसने मौत के घाट उतरवा दिया. लेकिन वो अपनी सबसे बड़ी गलती तो आगे करने वाला था और वो था युगांडा से भारतीयों को भगाना.

ब्रिटिश राज में युगांडा पहुंचे थे भारतीय
दरअसल ब्रिटिश राज के दौरान भारत से कई लोग युगांडा पहुंचे और वहां पर उन्होंने अपना खूब कारोबार जमाया. युगांडा पहुंचे भारतीय वहां के सबसे बड़े होटल व्यवसायी और बिजनेस टायकून बन चुके थे. युगांडा की अर्थव्यवस्था को भारतीयों ने काफी हद तक संभाल रखा था. भारतीय लोगों ने युगांडा के स्थानीय लोगों को रोजगार दे रखा था. ये देख ईदी अमीन अंदर ही अंदर बहुत जलता था. ये जलन आम लोगों में कम लेकिन युगांडा के ऊपर राज करने वाले क्रीम लोगों में बहुत ज्यादा थी.
ईदी अमीन का वो आदेश और भारतीयों की चिंता
साल था 1972, अगस्त का महीना चल रहा था. अचानक ईदी अमीन ने घोषणा की कि युगांडा में बसे 70 हजार भारतीय और दक्षिण एशियाई लोगों को तीन महीने में देश से बाहर जाना होगा. पहले तो लोगों को लगा कि ये मजाक है, लेकिन उन्हें समझ आ गया कि अब युगांडा में रहना उनके लिए खतरे से खाली नहीं है. एक-एक दिन बीत रहा है.
बताया जाता है कि, ईदी ने ये आदेश अपने सपने के आधार पर दिया था. जिसमें उसे उपरवाले ने ऐसा करने के लिए कहा था.
दो सूटकेस और कुछ पैसे ले जाने की थी इजाजत
ईदी अमीन के इस ऑर्डर का सबसे क्रूर और स्याह पक्ष ये था कि लोगों को अपने साथ सिर्फ 2 सूटकेस और कुछ पाउंड ही साथ ले जाने की इजाजत थी. लोग अपने पुरखों की जमीन और मेहनत से कमाई दौलत को युगांडा छोड़कर निकल गए. मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि, ईदी और उसके सैनिक भारतीयों से इतनी नफरत करते थे कि वे एयरपोर्ट पर लोगों को लूटने और मारपीट करने लगे. उनके कपड़े तक छीन लिये गए. अपने दौलत को ऐसे लूटता देख कई लोगों ने आत्महत्या कर ली.
तीन महीने के अंदर युगांडा भारतीयों से खाली हो गया. ब्रिटिश काल से युगांडा में रह रहे भारतीय ब्रिटेन से लेकर अमेरिका और भारत लौट गए.
ईदी अमीन को लगा बड़ा झटका
ईदी अमीन को लगता था कि भारतीयों के निकल जाने से देश की समस्याएं खत्म हो जाएंगी और लोग उसकी क्रूरता को भूल जाएंगे. लेकिन हुआ इसके ठीक उल्टा. ब्रिटिशर्स के अधीन रहे इस देश के लोगों के पास ना तो कोई स्किल थी ना ही रोजगार या कारोबार का तजुर्बा. युगांडा में रह रहे भारतीय वहां के बैंकिंग सेक्टर से लेकर कारोबार, टेक्सटाइल, उद्योग और यहां तक की होटल व्यवसाय खड़े किये थे. जिसकी वजह से वहां के लोगों को रोजगार मिलता था. भारतीयों के युगांडा से निकलते ही कुछ ही दिनों के भीतर ये सब ठप पड़ गया. देश भयानक आर्थिक कुचक्र में फंस गया. देश में भयानक बेरोजगारी पैदा हो गई. लोगों के पास खाने के लिए खर्च करने तक के पैसे नहीं बचे.
अमीन के किये का उसकी आने वाली पीढ़ियों ने हर्जाना भुगता. 1972 में युगांडा की अर्थव्यवस्था जो बेपटरी हुई वो आजतक खड़ी नहीं हो पाई. पिछले साल जब युगांडा के राष्ट्रपति भारत के दौरे पर आए तो उन्होंने ईदी अमीन के दौर में भारतीयों के देश निकाला को बड़ी भूल बताते हुए माफी मांगी.
क्या अमेरिका बन जाएगा युगांडा?
इसका जवाब अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारतीयों के योगदान पर टिका हुआ है. वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू के अनुसार अमेरिका में इस समय 50 लाख से ज्यादा भारतीय रहते हैं. जो वहां का सबसे बड़ा एशियाई समुदाय है. इनका टेक, हेल्थ, होटल और बैंकिंग सेक्टर में काफी दबदबा माना जाता है. इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि जहां अमेरिकी नागरिकों की औसत आय 64 हजार डॉलर है. वहीं भारतीय अमेरिकी लोगों की औसत आय 1 लाख डॉलर से भी ज्यादा है. अमेरिका की कई बड़ी कंपनियों जैसे गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और ओनलीफैन्स के सीईओ भारतीय मूल के हैं.
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भारतीय पलायन कर जाएं तो क्या होगा?
अमेरिका की इकोनॉमी काफी हद तक एक्सपर्ट्स और हाई-स्किल्ड लोगों पर टिकी हुई है. अगर भारतीय बड़ी संख्या में अमेरिका से पलायन कर जाएंगे तो अमेरिका के पास तुरंत उनकी जगह को भरने के लिए लोग नहीं होंगे. अमेरिका के लोगों को इसके लिए तैयार करने के लिए काफी समय और रिसोर्स लगेगा. इस दौरान जो अमेरिका को नुकसान होगा उसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता.
डोनाल्ड ट्रंप और उनके सपोर्टर्स को लगता है कि भारतीय अमेरिका में जाकर वहां के लोगों का काम छीन रहे हैं. जबकि आंकड़े ऐसा नहीं कहते. डेटा के अनुसार अमेरिका में भारत के सबसे योग्य पेशेवर जाते हैं. जिनकी संख्या अमेरिका में भी काफी कम है. ऐसे में वो वहां जाकर अमेरिका के विकास में अपना योगदान देते हैं. भारतीय वहां जाकर ऐसे उद्योग पैदा करते हैं जिनकी वजह से अमेरिकियों को रोजगार मिलता है.
– भारत एक्सप्रेस
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