नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की फरवरी आर्थिक समीक्षा के अनुसार, वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के बावजूद जनवरी में भारतीय अर्थव्यवस्था में कुछ सकारात्मक संकेत देखने को मिले. विनिर्माण परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI), वस्तु एवं सेवा कर (GST) संग्रह और ऑटोमोबाइल बिक्री के आंकड़ों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई.
जीएसटी संग्रह में 12.3% की वृद्धि
जनवरी 2025 में जीएसटी संग्रह पिछले वर्ष की तुलना में 12.3 प्रतिशत बढ़कर 1.96 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले नौ महीनों का उच्चतम स्तर है. इससे सरकार के राजस्व में मजबूती आई है और आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि का संकेत मिला है.
विनिर्माण पीएमआई छह महीने के उच्च स्तर पर
जनवरी में विनिर्माण पीएमआई 57.7 के स्तर पर पहुंच गया, जो दिसंबर 2024 में 56.4 था. यह वृद्धि दर्शाती है कि विनिर्माण क्षेत्र में सुधार हो रहा है और मांग में मजबूती बनी हुई है.
मुद्रास्फीति में कमी से नीतिगत निर्णयों के लिए अवसर
NCAER की महानिदेशक पूनम गुप्ता ने कहा कि हेडलाइन मुद्रास्फीति में गिरावट (4.3 प्रतिशत) ने नीतिगत निर्णयों के लिए अधिक अवसर प्रदान किए हैं. कृषि क्षेत्र में भी मजबूती देखने को मिली है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा मिलने की उम्मीद है.
आरबीआई ने किया ब्याज दर में कटौती
फरवरी में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने पांच वर्षों में पहली बार रेपो दर में कटौती करते हुए इसे 6.5 प्रतिशत से घटाकर 6.25 प्रतिशत कर दिया. अर्थशास्त्रियों के एक सर्वेक्षण के अनुसार, आगामी वित्तीय वर्ष के अंत तक यह दर 5.75 प्रतिशत तक आ सकती है. आरबीआई ने मुद्रास्फीति को वित्तीय वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही तक औसतन 4 प्रतिशत बनाए रखने का अनुमान लगाया है.
FII प्रवाह में अस्थिरता, FDI पर ध्यान देने की जरूरत
पूनम गुप्ता ने कहा कि विदेशी संस्थागत निवेश (FII) प्रवाह वैश्विक कारकों से अधिक प्रभावित होता है और इसमें अस्थिरता बनी रहती है. वर्तमान में भारत से एफआईआई निकासी वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा है और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भी इसी तरह का ट्रेंड देखने को मिल रहा है. ऐसे में भारत को विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था को स्थायी रूप से मजबूत किया जा सके.
-भारत एक्सप्रेस
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