सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में घरों को 24 घंटे के भीतर ध्वस्त करने के राज्य सरकार के फैसले की कड़ी आलोचना की है. कोर्ट ने अधिकारियों को फटकार लगाते हुए कहा कि कानून भी कोई चीज है. जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह साफ किया कि याचिकाकर्ताओं को घरों के पुननिर्माण की अनुमति दी जाएगी, यदि वे अपीलीय प्राधिकरण के समक्ष निर्धारित समय सीमा के भीतर अपील दायर करते हैं. यदि अपील खारिज हो जाती है तो याचिकाकर्ताओं को अपने खर्च पर घरों को पुनः ध्वस्त करना होगा.
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को हलफनामा दाखिल करने का दिया समय
इसके साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को हलफनामा दाखिल करने का समय दे दिया है. वही मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वैंकटरमणी ने कहा कि अवैध कब्जों पर नियंत्रण रखना राज्य सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण है. उन्होंने यह भी कहा कि यूपी सरकार ने प्रक्रिया का पालन करते हुए नोटिस जारी किया था. इससे पहले कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा की गई कार्रवाई को चौकाने वाला और गलत संदेश देने वाला बताया था.
अनुच्छेद 21 नाम की भी कोई चीज है-कोर्ट
कोर्ट ने कहा था अनुच्छेद 21 नाम की भी कोई चीज है. साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा था कि सरकार को लोगों को मकान वापस बना कर देना होगा. कोर्ट ने यह टिप्पणी प्रयागराज में एक वकील जुल्फिकार हैदर, प्रोफेसर अली अहमद, दो महिला सहित पांच लोगों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए किया था. जस्टिस ओका ने कहा था, अब हम आपके खर्च पर पुनर्निर्माण का आदेश देंगे. याचिकाकर्ताओं ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है.
याचिकाकर्ताओं ने लगाया ये आरोप
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि अधिकारियों ने शनिवार की रात को मकान ध्वस्तीकरण के लिए नोटिस जारी किया और अगले दिन उनके मकानों को ध्वस्त कर दिया। उनको अधिकारियों द्वारा कार्रवाई को चुनौती देने तक का मौका नही दिया, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी दिशा निर्देशों का उल्लंघन है. अटॉर्नी जनरल आर वैंकटरमणी ने कहा था कि याचिककताओं को नोटिस का जवाब देने के लिए समय दिया गया था, लेकिन कोर्ट ने एजी के दलीलों को खारिज कर दिया.
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इस तरह क्यों चिपकाया गया था नोटिस?
कोर्ट ने एजी से पूछा था कि नोटिस इस तरह क्यों चिपकाया गया? कुरियर से क्यों नहीं भेजा गया? कोई भी इस तरह नोटिस देगा और तोड़फोड़ करेगा. ये तोड़फोड़ का एक ऐसा मामला है जिसमें अत्याचार शामिल है. आप कहते है कि डाक से भेजने की कोई प्रक्रिया नहीं है, यहां नोटिस डाक से भेजा गया है. सरकार का कहना है कि यह जमीन गैंगेस्टर अतीक अहमद से जुड़ी हुई है.
एजी ने मामले को दोबारा हाई कोर्ट भेजने को कहा था, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया था. कोर्ट ने कहा था हाई कोर्ट दोबारा भेजने से वहां समय लगेगा. कोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से पेश वकील से कहा था कि अगर आप हलफनामा दाखिल करके इसका विरोध करना चाहते हैं, तो ठीक है अन्यथा कम शर्मनाक रास्ता यही है कि उन्हें निर्माण कार्य करने दिया जाए और फिर कानून के मुताबिक उन्हें नोटिस दिया जाए.
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