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भारत में अंतरराष्ट्रीय स्कूलों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी, IB और IGCSE अब छोटे शहरों तक पहुंचे

भारत में अंतरराष्ट्रीय स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. अब IB और IGCSE बोर्ड सिर्फ मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं, बल्कि छोटे शहरों में भी अपनी पहुंच बना रहे हैं.

International Schools in India
Prashant Rai Edited by Prashant Rai

कभी सिर्फ चुनिंदा अमीर परिवारों तक सीमित रहने वाले अंतरराष्ट्रीय स्कूल अब भारत में आम चर्चा का विषय बन चुके हैं. भारत में अब दुनिया में दूसरी सबसे ज्यादा अंतरराष्ट्रीय स्कूलों की संख्या है. ये स्कूल सिर्फ नाम के लिए नहीं, बल्कि वैश्विक शिक्षा बोर्डों से मान्यता प्राप्त हैं.

बीते दशक में बड़ा बदलाव

पिछले कुछ सालों में, मध्यम वर्गीय परिवार भारतीय बोर्ड और विदेशी पाठ्यक्रम के बीच चुनाव करने के मोड़ पर आ गए हैं. साल 2000 में भारत में केवल 8 स्कूल IB प्रोग्राम ऑफर कर रहे थे, जबकि IGCSE (कैम्ब्रिज पाठ्यक्रम) का कोई पंजीकरण भी नहीं था. 2011-12 तक, कैम्ब्रिज इंटरनेशनल और इंटरनेशनल बैकलॉरिएट (IB) बोर्ड से जुड़े स्कूलों की संख्या क्रमशः 197 और 99 हो चुकी थी.

अब, ISC रिसर्च के ताजा आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2025 तक भारत में 972 अंतरराष्ट्रीय स्कूल हो चुके हैं, जो 2019 में 884 थे. यह 5 साल में 10% की वृद्धि दर्शाता है. वहीं, वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय स्कूलों की कुल संख्या 8% बढ़कर 14,833 हो गई है.

किन राज्यों में सबसे ज्यादा स्कूल?

भारत में महाराष्ट्र इस सूची में सबसे आगे है, जहां 210 स्कूल IB या IGCSE पाठ्यक्रम चला रहे हैं. इसके बाद कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं.

ISC रिसर्च के फील्ड मैनेजर अभिषेक पांडे का कहना है, “भारतीय परिवारों, प्रवासियों (Expatriates) और एनआरआई (NRI) परिवारों की अंतरराष्ट्रीय स्कूलों में दिलचस्पी बढ़ी है. यही कारण है कि मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और दिल्ली जैसे शहरों में अंतरराष्ट्रीय स्कूलों में निवेश बढ़ रहा है. माता-पिता अब ऊंची आय अर्जित कर रहे हैं और वे अपने बच्चों के करियर को सुरक्षित करने के लिए वैश्विक पाठ्यक्रम को प्राथमिकता दे रहे हैं.”

अब छोटे शहरों में भी पहुंच

पहले यह स्कूल सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित थे, लेकिन अब सांगली (महाराष्ट्र), दावणगेरे (कर्नाटक) और बैतूल (मध्य प्रदेश) जैसे छोटे शहरों में भी खुल रहे हैं. कैम्ब्रिज बोर्ड हर साल 100 नए स्कूल जोड़ रहा है, जबकि IB के 30 से 40 नए स्कूल खुल रहे हैं.

कैम्ब्रिज एजुकेशन के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक महेश श्रीवास्तव कहते हैं, “आज भारतीय मध्य वर्ग की महत्वाकांक्षाएं पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं. यह बदलाव सिर्फ मेट्रो शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब टियर 2 और टियर 3 शहरों में भी अंतरराष्ट्रीय शिक्षा की मांग बढ़ रही है.”

अंतरराष्ट्रीय शिक्षा क्यों पसंद कर रहे हैं माता-पिता?

पूर्व IB प्रतिनिधि फरज़ाना दोहादवाला के अनुसार, “माता-पिता को सबसे ज्यादा पसंद पर्सनलाइज़्ड लर्निंग (छोटी कक्षाएं) आती हैं. आमतौर पर हर कक्षा में सिर्फ 25-30 छात्र होते हैं. यहां पढ़ाई का तरीका भी अलग है. शिक्षक केवल सामने खड़े होकर पढ़ाते नहीं, बल्कि इंटरएक्टिव लर्निंग और एक्सपेरिमेंटल लर्निंग पर ज़ोर दिया जाता है.”

JBCN एजुकेशन के प्रबंध निदेशक कुणाल दलाल कहते हैं, “अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम छात्रों को प्रश्न पूछने, विभिन्न विषयों को आपस में जोड़ने और वास्तविक दुनिया की समस्याओं को हल करने के लिए प्रेरित करता है.”

अब छात्र भारत में भी कर रहे हैं उच्च शिक्षा

पहले, अंतरराष्ट्रीय स्कूलों के अधिकतर छात्र विदेश में पढ़ने जाते थे. लेकिन अब, 60-70% छात्र भारत में ही कॉलेज की पढ़ाई कर रहे हैं.

पहले अंतरराष्ट्रीय स्कूलों का नेतृत्व विदेशी शिक्षक करते थे, लेकिन अब भारतीय शिक्षक, जो वैश्विक मानकों के अनुसार प्रशिक्षित हैं, इन स्कूलों का संचालन कर रहे हैं. इससे यह शिक्षा प्रणाली भारत की पारंपरिक शिक्षा संस्कृति के साथ घुल-मिल गई है.

अंतरराष्ट्रीय स्कूल: शिक्षा या बिजनेस?

शिक्षाविद फ्रांसिस जोसेफ का कहना है कि अब यह सिर्फ शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि ब्रांडिंग और रणनीति का भी मामला है.
“कोई माता-पिता CBSE स्कूल के लिए सालाना 4 लाख रुपये नहीं देंगे. लेकिन अगर स्कूल को ‘इंटरनेशनल’ टैग मिल जाए, तो फीस पर कोई सवाल नहीं उठाता.”

फ्रांसिस जोसेफ बताते हैं, “अब अंतरराष्ट्रीय स्कूल सिर्फ स्कूल नहीं, बल्कि स्टेटस सिंबल बन गए हैं. कई निजी मालिकों के लिए यह एक लाभदायक व्यवसाय मॉडल भी है.”

अब, कई स्कूल दो पाठ्यक्रम (Dual Curriculum) एक ही कैंपस में चला रहे हैं, जहां राष्ट्रीय बोर्ड और अंतरराष्ट्रीय बोर्ड साथ-साथ चलते हैं.


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– भारत एक्सप्रेस



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