दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने गुर्जर रेजीमेंट गठित करने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया है. याचिका में केंद्र सरकार को भारतीय आर्मी में एक गुर्जर रेजिमेंट गठित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी.
मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से पूछा कि ऐसा कौन सा कानून है जो आपको इस तरह की रेजीमेंट रखने का अधिकार देता है? कोर्ट ने पूछा कि ऐसा अधिकार कहां है? कोर्ट ने यह भी पूछा कि संविधान या किसी अन्य अधिनियम या प्रथागत कानून का कौन सा प्रावधान किसी विशेष समुदाय के लोगों की रेजिमेंट रखने का अधिकार देता है.
समान अवसर, नहीं बनेंगी नई जातिगत रेजीमेंट्स
मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील मोनिका अरोड़ा ने कोर्ट को बताया कि आजादी के बाद से सरकार ने समान भर्ती के.अवसर सुनिश्चित करने के लिए विशिष्ट समुदायों, वर्गों, धर्मो या क्षेत्रों के आधार पर नई रेजिमेंट नहीं बनाने की नीति बनाए रखी है.
उन्होंने आगे बताया कि विभिन्न याचिकाओं वीआईपी सन्देर्भो, संसदीय प्रश्नों और निजी सदस्य विधेयकों में ऐतिहासिक शख़्तियतों, राष्ट्रीय नायकों और क्षेत्रीय पहचान के आधार पर नई रेजिमेंट बनाने की मांग की गई है. फिर भी सरकार अपनी नीति पर अडिग है. यह जनहित याचिका रोहन बसोया नामक व्यक्ति ने दायर की थी.
याचिका में दावा किया गया था कि समृद्ध सैन्य विरासत के बावजूद गुज्जरों को सिख, जाट, राजपूत, गोरखा और डोगरा जैसे अन्य सैन्य समुदायों के विपरीत एक समर्पित रेजिमेंट नहीं दी गई हैं.
कोर्ट की सख्ती – बिना शोध याचिकाएं न दायर करें
याचिका में यह भी कहा गया था कि गुर्जर समुदाय का एक वीरतापूर्ण इतिहास रहा है और उन्होंने 1857 की क्रांति, 1947, 1965, 1971 की भारत पाक युद्धों, कारगिल युद्ध 1999 और जम्मू कश्मीर में आतंक विरोधी अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उसके बावजूद उन्हें सेना में कोई समर्पित रेजीमेंट नहीं दी.
कोर्ट ने वकील को ऐसी जनहित याचिकाओं को लेने से पहले शोध करने की सलाह दी, जिसके बाद वकील ने याचिका को वापस ले लिया है. अदालत ने यहां तक संकेत दिया कि यदि याचिका पर जोर दिया गया तो याचिकाकर्ता पर जुर्माना लगाया जा सकता है.
-भारत एक्सप्रेस
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