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युद्ध नहीं, संवाद हो समाधान: वैश्विक संघर्षों पर मानवीय दृष्टिकोण

पिछले दो वर्षों में दुनिया के कई हिस्सों में जो युद्ध और संघर्ष देखने को मिले, उन्होंने न केवल कूटनीतिक विफलताओं को उजागर किया, बल्कि मानवता के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं.

शाहिद सईद: वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता


विश्व जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें हर मोर्चे पर संवाद की आवश्यकता है, टकराव की नहीं. इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ता संघर्ष, हथियारों के गर्जन और बमों की गूंज के बीच, यह प्रश्न बार-बार खड़ा हो रहा है कि क्या सैन्य ताकत से टिकाऊ समाधान निकल सकता है? क्या रॉकेट, मिसाइल, ड्रोन और गोले, सभ्यताओं के बीच कोई पुल बना सकते हैं? युद्ध का यह सिलसिला, जहाँ मासूम जानें लगातार जा रही हैं, बच्चों के शव मलबों से निकल रहे हैं, और पीढ़ियों की मेहनत से खड़ी की गई संपत्तियाँ पल भर में राख में बदल रही हैं—यह हमें आत्मनिरीक्षण करने को विवश करता है कि क्या हम 21वीं सदी की ओर बढ़ रहे हैं या विनाश की ओर?

पिछले दो वर्षों में दुनिया के कई हिस्सों में जो युद्ध और संघर्ष देखने को मिले, उन्होंने न केवल कूटनीतिक विफलताओं को उजागर किया, बल्कि मानवता के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं. रूस-यूक्रेन युद्ध में अब तक दोनों पक्षों को मिलाकर लगभग 4.5 लाख से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें बड़ी संख्या में नागरिक भी शामिल हैं.

संयुक्त राष्ट्र और अन्य एजेंसियों के मुताबिक़, इस युद्ध ने करीब 1.5 करोड़ लोगों को उनके घरों से विस्थापित कर दिया है और लगभग $1 ट्रिलियन (₹83 लाख करोड़ से अधिक) की संपत्ति और बुनियादी ढाँचा नष्ट हो चुका है. वहीं अक्टूबर 2023 से शुरू हुए इज़रायल-गाजा संघर्ष में अब तक ग़ाज़ा पट्टी में 37,000 से अधिक फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं, जिनमें लगभग 40% बच्चे हैं. इज़रायल की ओर भी 1,500 से अधिक नागरिकों की जान गई है. गाज़ा में अस्पताल, स्कूल, मस्जिदें और चर्च सब बर्बाद हो चुके हैं. शहर का लगभग 60% हिस्सा खंडहर बन चुका है. अन्य परोक्ष युद्धों—जैसे तुर्की-ईरान, सीरिया, यमन—में भी लाखों लोग मारे गए हैं और करोड़ों शरणार्थियों की त्रासदी जारी है.

इन आंकड़ों को देखने के बाद यह कहना गलत नहीं होगा कि युद्ध सिर्फ कूटनीतिक असफलता नहीं, बल्कि यह मानवता के साथ विश्वासघात है. युद्ध बमों से नहीं, बच्चों के भविष्य से भी खेलते हैं. यह न सिर्फ इमारतें गिराते हैं, बल्कि समाजों को टूटने पर मजबूर कर देते हैं. मानसिक आघात, बेरोजगारी, गरीबी और पीढ़ियों तक चलने वाली त्रासदी युद्ध की अनकही सच्चाई होती है.

भारत का रुख स्पष्ट हो, देश संवाद की परंपरा का संवाहक रहा

ऐसे में भारत का रुख स्पष्ट, सुसंगत और नैतिक होना चाहिए. भारत शांति, सह-अस्तित्व और संवाद की परंपरा का संवाहक रहा है. महात्मा गांधी, सरदार पटेल और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भूमि होने के नाते भारत का नैतिक दायित्व बनता है कि वह मानवता और न्याय के पक्ष में खड़ा हो. यह सही है कि भारत को किसी पक्ष विशेष के साथ खड़े होने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन उसे ज़रूर यह कहना चाहिए कि युद्ध किसी भी परिस्थिति में समाधान नहीं हो सकता. भारत को चाहिए कि वह संयुक्त राष्ट्र, जी-20 और अन्य वैश्विक मंचों पर सक्रिय रूप से यह प्रस्ताव रखे कि संवाद से ही समाधान निकलेगा, टकराव से नहीं.

यह बात भी बार-बार सुनने को मिलती है कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसी स्थितियाँ बनती हैं, तब भारत को दूसरों को मानवता का पाठ पढ़ाने से पहले खुद को देखना चाहिए. यह तर्क सुनने में तर्कपूर्ण लगता है, परंतु इसका उत्तर भारत के आचरण में ही छिपा है.

भारत की सैन्य कार्रवाइयाँ कभी भी आम जनता या बच्चों पर केंद्रित नहीं होतीं. भारत ने जब भी कोई सर्जिकल स्ट्राइक या एयर स्ट्राइक की है, उसका उद्देश्य केवल और केवल सीमापार से आ रहे आतंक के ठिकानों को नष्ट करना रहा है. भारत की कार्रवाइयाँ आतंकवाद के विरुद्ध होती हैं, मासूमों के विरुद्ध नहीं. जबकि कुछ देश बम बरसाते हैं अस्पतालों, रिहायशी कॉलोनियों, बच्चों की पाठशालाओं पर—ऐसी ‘रणनीति’ का भारत घोर विरोध करता रहा है और करता रहेगा. भारत की शक्ति संयम और न्याय का उदाहरण है, ईगो और तानाशाही का नहीं.

युद्ध अब एक राजनीतिक और औद्योगिक व्यवसाय बन चुका है

आज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि युद्ध अब एक राजनीतिक और औद्योगिक व्यवसाय बन चुका है. कुछ शक्तिशाली राष्ट्र या समूह हथियार बेचने के लिए युद्ध भड़काते हैं. एक देश को हथियार बेचने के लिए दूसरे देश को युद्ध की आग में झोंकना कहाँ की इंसानियत है? यह सोच न केवल खतरनाक है, बल्कि एक सुनियोजित मानवता विरोधी नीति है. भारत को चाहिए कि वह इस विषय पर वैश्विक नैतिक नेतृत्व करे और यह दो टूक कहे कि हथियारों की होड़ में मानवता का नाश किसी भी सभ्य समाज को मंज़ूर नहीं हो सकता.

भारत को केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं, बल्कि मार्गदर्शक राष्ट्र बनना होगा. उसे चाहिए कि वह शांतिपूर्ण मध्यस्थता के प्रयास करे—चाहे वह इज़रायल-ईरान के बीच हो या अन्य संघर्ष क्षेत्रों में. भारत को मानवीय संकट के समय दवाइयाँ, खाद्य सामग्री और सहायता पहुँचाकर अपनी संवेदनशीलता और कर्तव्यबोध का परिचय देना चाहिए. भारत की छवि एक संतुलित, विवेकशील और मानवीय राष्ट्र की बन चुकी है—इस छवि को वैश्विक नेतृत्व में बदलना समय की मांग है.

भारत की शक्ति का वास्तविक अर्थ केवल सैन्य ताकत नहीं, बल्कि उसका विवेक और संवेदना है. भारत को यह संदेश देना चाहिए कि शक्ति का प्रयोग सुरक्षा और सेवा के लिए होता है, न कि विध्वंस और अहंकार के लिए. किसी भी शक्ति का प्रदर्शन यदि केवल सत्ता के अहंकार और राजनीतिक लाभ के लिए किया जाए, तो वह मानवता के विनाश का रास्ता बन जाती है. ऐसे किसी भी दृष्टिकोण का भारत विरोध करता है.

भारत का शाश्वत संदेश ‘वसुधैव कुटुंबकम्’—’संपूर्ण विश्व एक परिवार है’

आज जब पूरी दुनिया जलवायु संकट, महंगाई, बेरोजगारी और सामाजिक असंतुलन से जूझ रही है, तब युद्ध एक ऐसा अतिरिक्त संकट है, जो आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर एक अमिट काला धब्बा छोड़ देगा. युद्ध न सिर्फ आज की पीढ़ी का खून बहाता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, संसाधन और अवसर छीन लेता है. भारत को दृढ़ता के साथ यह कहना चाहिए कि यह कोई ईगो की लड़ाई नहीं है. यदि दुनिया में अब भी विवेक और मानवता बची है, तो उसे युद्ध के मैदान से नहीं, संवाद की मेज़ से समाधान निकालना होगा.

भारत का शाश्वत संदेश ‘वसुधैव कुटुंबकम्’—’संपूर्ण विश्व एक परिवार है’—आज पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है. यह केवल एक आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है. भारत को चाहिए कि वह पूरी दुनिया को यह सिखाए कि ‘युद्ध बंद करो, संवाद शुरू करो’. मानवता की असली जीत वही है जिसमें सभी को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार मिले—बिना भय के, बिना बारूद के.

-भारत एक्सप्रेस



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