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जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा- भारत का संविधान तभी जीवित रहेगा, जब अधिक साहसी और निडर न्यायाधीशों की नियुक्ति होगी

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि भारत का संविधान तभी जीवित रहेगा, जब न्यायपालिका में स्वतंत्र, साहसी और निडर न्यायाधीश होंगे. उन्होंने कानून के शासन और न्यायिक स्वतंत्रता को लोकतंत्र की नींव बताया.

महाराष्ट्र और गोवा बार काउंसिल सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस अभय एस ओका के सम्मान में आयोजत विदाई समारोह के दौरान जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि भारत का संविधान तभी जीवित रहेगा, जब अधिक साहसी और निडर न्यायाधीशों की नियुक्ति होगी. जस्टिस भुइयां ने कहा कि जैसा कि कैरोलिन कैनेडी ने कहा था, हमें अधिक साहसी और निडर न्यायाधीशों की आवश्यकता है.

हमारे पास ऐसे न्यायाधीश रहे हैं और भविष्य में भी होंगे और इसी तरह संविधान जीवित रहेगा. उन्होंने कैरोलिन केनेडी का हवाला देते हुए कहा कि सभी लोकतंत्रों की नींव कानून का शासन है और इसका अर्थ है कि हमें एक स्वतंत्र न्यायपालिका की जरूरत है, जिसमें न्यायाधीश राजनीतिक दलों से स्वतंत्र होकर निर्णय ले सकें.

न्यायिक सेवा में ईमानदारी और नैतिकता को बताया सर्वोपरि

उन्होंने कहा कि यह भारत में सटीक है और यह जस्टिस ओका की यात्रा को दर्शाता है. भारतीय संविधान के मूल ढांचे की यात्रा पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यद्यपि भारत और पाकिस्तान सीमाओं के पार और क्रिकेट के मैदान पर एक दूसरे के विरोधी थे, फिर भी भारत सदैव अहिंसा और शांति का देश रहा है.

उन्होंने ने 1963 के पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के फजलुर कादिर चौधरी बनाम मोहम्मद अब्दुल हक मामले पर चर्चा की, जिसमें पाकिस्तान में संविधान के मूल ढांचे को बरकरार रखा गया था और कहा गया था कि यह बुनियादी विशेषताओं की अवधारणा का पहला अंकुरण था. उन्होंने कहा कि यह कहना गलत है कि कानून बनाने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप नही कर सकते.

उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह कि अवधारणा का कोई कानूनी या संवैधानिक आधार नही है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम संविधान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द किया. उन्होंने कहा कि इस फैसले से तत्कालीन वित्तमंत्री अरुण जेटली नाखुश थे, लेकिन न्यायपालिका की स्वतंत्रता से कोई समझौता नही किया जा सकता.

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान का मूलभूत हिस्सा है.


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