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न्यायपालिका पर पुलिस का अप्रत्याशित हस्तक्षेप: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 90 वर्षीय याचिकाकर्ता और उनके वकील को धमकाने व रिश्वत मामले में पुलिस पर सख्त टिप्पणी की है. कोर्ट ने ACS गृह और एसपी जौनपुर से हलफनामा मांगा है और पीड़ित परिवार को सुरक्षा देने का आदेश दिया है.

Allahabad High Court
Edited by Radha Priya

प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका (PIL) में पुलिस के चौंकाने वाले आचरण पर कड़ा रुख अपनाया है, जिसमें याचिकाकर्ता और उसके वकील दोनों को धमकाया गया.

न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर की पीठ ने इस मामले को न्यायिक प्रक्रिया में एक गंभीर अतिक्रमण बताया है, जो आपराधिक अवमानना ​​के तहत कड़ी सजा का पात्र हो सकता है.

यह मामला तब सामने आया जब 90 वर्षीय याचिकाकर्ता गौरी शंकर सरोज और उनके पोते ने अदालत को बताया कि पुलिस ने उन्हें जनहित याचिका वापस लेने की धमकी देने के लिए उनके घर का दौरा किया.

पुलिस ने कथित तौर पर याचिकाकर्ता के पोते को गिरफ्तार करने का भी प्रयास किया और रिश्वत लेने के बाद ही उन्हें रिहा किया. इस घटना के बाद, अदालत ने पुलिस अधीक्षक (एसपी), जौनपुर, डॉ. कौस्तुभ को मामले की नई जांच का आदेश दिया.

थाना प्रभारी भी लापरवाही पर निलंबित

एसपी जौनपुर ने एक व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल किया, जिसमें याचिकाकर्ता के आरोपों की पुष्टि हुई. एसपी की जांच में पाया गया कि दो पुलिस कांस्टेबल, पंकज मौर्य और नितेश कुमार गौड़, एक हल्का लेखपाल के साथ, याचिकाकर्ता के घर गए थे और उनके पोते को कथित तौर पर 2000 रुपये की रिश्वत लेने के बाद रिहा करने से पहले जबरन ले गए थे. एसपी ने स्वीकार किया कि पुलिस कर्मियों का आचरण “अवैध” था.

इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए, एसपी जौनपुर ने दोनों कांस्टेबलों को निलंबित कर दिया है और उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू कर दी है. इसके अतिरिक्त, थाना प्रभारी, पुलिस थाना मुंगरा बादशाहपुर, जौनपुर को भी “शिथिलता और लापरवाही” के लिए तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है.

SC/ST और भ्रष्टाचार अधिनियम की धाराएं लागू

पुलिस ने कांस्टेबलों, लेखपाल और अन्य के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 और एससी/एसटी अधिनियम के तहत एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) भी दर्ज की है. जिला मजिस्ट्रेट, जौनपुर को लेखपाल के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने के लिए भी लिखा गया है.

हालांकि, अदालत की राहत अल्पकालिक थी. याचिकाकर्ता के वकील, श्री विष्णु कांत तिवारी ने अदालत को सूचित किया कि 9 जुलाई की देर शाम पुलिस ने उनके घर पर छापा मारा और उनके पिता के साथ दुर्व्यवहार किया, उनके ठिकाने के बारे में पूछताछ की और पूछा कि याचिकाकर्ता जौनपुर मुख्यालय क्यों गए थे.

श्री तिवारी ने एक हलफनामा भी दाखिल किया, जिसमें मुंगरा बादशाहपुर पुलिस स्टेशन के स्टेशन हाउस ऑफिसर दिलीप सिंह द्वारा उनके फोन पर बार-बार उत्पीड़न और बाद में पुलिस द्वारा उनके घर पर “छापेमारी” का विवरण दिया गया.

ACS (गृह) और SP को हलफनामा दाखिल करने का आदेश

न्यायालय ने इस आचरण को “न्यायिक व्यवस्था के अस्तित्व पर आघात” बताया और इसे रोकने की आवश्यकता पर जोर दिया. अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को इस रिट याचिका में एक पक्षकार के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया है.

अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और एसपी जौनपुर दोनों को 15 जुलाई, 2025 तक अपने-अपने हलफनामे दाखिल करने का आदेश दिया गया है, जब इस मामले की अगली सुनवाई होगी. न्यायालय ने श्री विष्णु कांत तिवारी और उनके परिवार की सुरक्षा और स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए सख्त आदेश जारी किए हैं.

पुलिस को श्री तिवारी या उनके परिवार के किसी भी सदस्य से टेलीफोन पर संपर्क करने, धमकाने, परेशान करने, गिरफ्तार करने, हिरासत में लेने, उनके घर में घुसने या उन्हें कहीं भी रोकने से प्रतिबंधित किया गया है.

यदि पुलिस को श्री तिवारी से बात करने की आवश्यकता है, तो उन्हें अदालत की पूर्व अनुमति लेनी होगी. यह आदेश तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है और संबंधित अधिकारियों को प्रेषित कर दिया गया है.


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-भारत एक्सप्रेस



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