सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में बड़ा आदेश दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आदेश के पालन में देरी किसी कारण से जानबूझकर की जाती है कि उसे अवमानना नही माना जाएगा. सीजेआई बी आर गवई और जस्टिस ए. जी मसीह की पीठ ने यह आदेश दिया है. कोर्ट एक पूर्व बैंक प्रबंधक की ओर से दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की है. अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा अवमानना याचिका में पेंशन की मांग उठाने पर भी नाराजगी जाहिर की है.
केवल विलंब के आधार पर दोषारोपण नहीं किया जा सकता- जस्टिस मसीह
कोर्ट ने कहा कि पेंशन पर पहले कोई आदेश नही दिया गया था, इसलिए अवमानना कार्यवाही में नया दावा नही किया जा सकता है. प्रबंधक पर आरोप था कि बैंक ने अदालत द्वारा निर्धारित तीन महीने की समय सीमा में उसकी बकाया राशि का भुगतान नहीं किया. मामले की सुनवाई के दौरान बैंक ने देरी को अनजाने बताया और पंजाब नेशनल बैंक के साथ विलय के बाद उत्पन्न प्रशासनिक दिक्कतों तथा तीन दशक पुराने रिकॉर्ड खोजने की चुनौतियों का हवाला दिया था.
कोर्ट ने माना कि समयसीमा का पालन न करना उचित नहीं था, लेकिन देरी को जानबूझकर उल्लंघन नही माना जा सकता है. सुनवाई के दौरान जस्टिस मसीह ने टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल विलंब के आधार पर दोषपूर्ण का अनुमान नही लगाया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2002 के झारेश्वर प्रसाद पॉल बनाम तारक नाथ गांगुली मामले का हवाला देते हुए एक बार फिर कहा कि अवमानना कार्यवाही का इस्तेमाल वैकल्पिक न्यायिक मंच को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता है.
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