दिल्ली हाई (Delhi High Court) कोर्ट ने वैवाहिक विवाद के मामले में एक अहम फैसला दिया है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सिर्फ पत्नी के गहने लेने भर से उसके खिलाफ क्रूरता का मामला नहीं चलाया जा सकता है. जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने पति के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया हैं.
2007 में हुई दूसरी शादी, 2010 में पहला तलाक
यह मामला एक वकील और उसकी पूर्व मुवक्किल की फिल्मी प्रेम कहानी पर आधारित थी, जिसका अंत कानूनी पचड़ों और तलाक के आरोपों से हुआ. दरअसल एक वकील साहब ने अपनी मुवक्किल का तलाक करवाया. मदद करते-करते प्यार हो गया. दोनों ने 2007 में शादी कर ली. लेकिन शादी के तीन साल बाद पता चला कि महिला का पहला तलाक तो 2010 में हुआ था. इसका मतलब की कानूनी तौर पर कभी शादी हुई ही नहीं. इसपर पत्नी भड़क गई और पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दिया.
एफआईआर में महिला का कहना था कि उसके पति ने वित्तीय हेराफेरी कर उसके जॉइंट अकाउंट से लाखों रुपए निकाल लिए. इसके साथ ही घर के लॉकर से लाखों रुपये के गहने निकालकर उन्हें गिरवी रखा और एक नया घर खरीदा. इस मामले के बारे में पूछताछ करने पर उसे धमकाया और प्राइवेट वीडियों लीक करने की धमकी दी. पत्नी ने आरोपों पर 498A के तहत एफआईआर दर्ज करा दिया.
घर खरीदने के लिए गहनों को रखा गिरवी- महिला का आरोप
महिला का यह भी आरोप था कि व्यक्ति ने स्वीकार किया है कि उसने घर खरीदने के लिए उन गहनों को गिरवी रखा और धमकी दी कि वह उसके अंतरंग वीडियो जारी कर देगा. पति द्वारा दायर याचिका में कहा गया था कि उसकी पत्नी ने उसे धोखा दिया था और यह तथ्य छुपाया था कि उसने 2010 में अपने पहले पति से तलाक लिया था, जबकि उनकी शादी पहले ही हो चुकी थी.
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस ने भी माना कि महिला ने मामले से संबंधित कुछ तथ्य छुपाए थे. कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी के प्रति वास्तव में क्रूरता करता हैं तो उसे इस अपराध के लिए दोषी ठहराया जा सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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