पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया द्वारा हाल ही में प्रकाशित पुस्तक जवाहरलाल नेहरू हाजिर हों लेखक पंकज चतुर्वेदी की एक अनूठी कृति है, जो भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कारावास काल को अदालती दस्तावेजों के माध्यम से जीवंत कर देती है. पंडित नेहरू, जिन्हें ‘चाचा नेहरू’ के नाम से जाना जाता है, न केवल स्वतंत्रता संग्राम के नायक थे, बल्कि आधुनिक भारत के दृष्टाकार भी.
यह किताब पंडित नेहरू के उन सवा आठ सालों को केंद्र में रखती है, जो उन्होंने ब्रिटिश जेलों में बिताए—कुल 3,259 दिन, नौ बार की कैद में. लेकिन यह महज जीवनी नहीं, बल्कि एक कानूनी थ्रिलर है, जहां जेल और अदालतें नेहरू की आवाज का मंच बन जाती हैं.
कारावास से संविधान तक की यात्रा
पुस्तक का केंद्रीय बिंदु 1915 से 1947 तक का वह दौर है, जब नेहरू ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल को अपनी ‘बोलने की जगह’ बना लिया. ब्रिटिश साम्राज्य की सख्ती के बावजूद, नेहरू ने अदालतों में अपनी पैरवी खुद की—बिना वकील के. लेखक ने अदालती रिकॉर्ड्स, नेहरू के भाषणों, पत्रों और जेल डायरी से एक आकर्षक कथा बुनी है.
1922 में पहली गिरफ्तारी से लेकर 1945 में अंतिम रिहाई तक, नेहरू ने हर सुनवाई को एक राजनीतिक मंच बना दिया. वे साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता और असमानता पर सीधा प्रहार करते थे. पुस्तक बताती है कि कैसे अदालती बहसें स्वतंत्रता संग्राम को कानूनी गलियारों से संविधान तक ले गईं.
लेखक नेहरू को एक ‘फिलॉसॉफर-स्टेट्समैन’ के रूप में चित्रित करते हैं, जो जेल की चारदीवारी में भी वैश्विक इतिहास और भारतीय दर्शन पर विचार करते रहे.
एक अध्याय में नेहरू का 1930 का लाहौर ट्रायल वर्णित है, जहां उन्होंने कहा था: “मैं ब्रिटिश न्याय व्यवस्था का सम्मान करता हूं, लेकिन यह न्याय नहीं, दमन है.”
ऐतिहासिक दस्तावेजों का जीवंत चित्रण
जवाहरलाल नेहरू हाजिर हों की सबसे बड़ी ताकत इसका प्राथमिक स्रोतों पर आधारित होना है. लेखक ने पंडित नेहरू के मूल भाषणों और अदालती रिकॉर्ड्स को हिंदी में अनुवादित कर पाठकों के लिए सुलभ बनाया है. यह पुस्तक पंडित नेहरू के वैज्ञानिक दृष्टिकोण, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के प्रति समर्पण को रेखांकित करती है—वही मूल्य जो आज ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ का आधार हैं.
एक समीक्षा में इसे “इतिहास की विकृति के खिलाफ एक हथियार” कहा गया है, खासकर जब पंडित नेहरू को राजनीतिक बहसों में निशाना बनाया जाता है.
एक और खूबी है इसका संदर्भिक महत्व. आज जब पंडित नेहरू की विरासत पर बहस छिड़ी रहती है चाहे कश्मीर मुद्दे पर या आर्थिक नीतियों पर यह किताब याद दिलाती है कि नेहरू की गलतियां मानवीय थीं.
न्याय के योद्धा
जवाहरलाल नेहरू हाज़िर हों एक ऐसी किताब है जो पढ़ते हुए आपको अदालत की चौखट पर खड़ा कर देती है, जहां नेहरू अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं. पंकज चतुर्वेदी ने साबित किया है कि पंडित नेहरू न केवल स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि न्याय के योद्धा भी. उनकी जयंती पर यह पुस्तक पढ़ना विशेष रूप से प्रासंगिक है—यह हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र की रक्षा अदालतों और जेलों से ही शुरू होती है.
हालांकि, पुस्तक में कमला नेहरू के साथ उनके संबंध या इंदिरा से पत्राचार पर कम ध्यान दिया है, जो इसे अधिक मानवीय बना सकती थी.
यह किताब नेहरू के ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ जैसे कार्यों से जुड़ती है, लेकिन अदालती दस्तावेजों के जरिए एक नया आयाम जोड़ती है. कुल मिलाकर, 300 से अधिक पृष्ठों वाली यह कृति इतिहास, कानून और राजनीति का अनोखा मिश्रण है.
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-भारत एक्सप्रेस
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