आज महाश्वेता देवी का जन्म शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है. 14 जनवरी 1926 को ढाका (अब बांग्लादेश) में जन्मीं यह विलक्षण लेखिका, समाज सेवी, कार्यकर्ता और निडर आवाज ने अपने साहित्य और सक्रियता से भारतीय समाज के सबसे वंचित वर्गों आदिवासियों, दलितों, स्त्रियों और शोषितों की पीड़ा को शब्दों में उतारा और उनके अधिकारों के लिए जीवनभर संघर्ष किया.
महाश्वेता देवी का जन्म एक साहित्यिक और सामाजिक रूप से जागरूक परिवार में हुआ—पिता मनीष घटक प्रसिद्ध कवि-उपन्यासकार थे, माता धरित्री देवी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता. विश्व-भारती, शांतिनिकेतन से अंग्रेजी में स्नातक और कोलकाता विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर करने के बाद उन्होंने शिक्षिका, पत्रकार और व्याख्याता के रूप में काम किया. 1984 में वे पूर्णकालिक लेखन और सक्रियता के लिए सेवानिवृत्त हुईं.
उनका लेखन महज साहित्य नहीं था. यह एक हथियार था, एक प्रतिरोध था. उन्होंने 100 से अधिक उपन्यास और 20 से अधिक लघुकथा संग्रह लिखे, मुख्यतः बांग्ला में, जिनमें से कई अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में अनूदित हुए. उनकी रचनाएं आदिवासी, दलित, स्त्री और शोषित वर्गों के संघर्ष को केंद्र में रखती हैं. वे नक्सलबाड़ी आंदोलन, आदिवासी विद्रोह और सामाजिक अन्याय की गवाह बनीं.
कुछ प्रमुख रचनाएं और उनका महत्व:
- हजार चौरासी की मां (Hajar Churashir Maa, 1974)— नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौरान पुलिस द्वारा मारे गए बेटे की मां की राजनीतिक जागृति की मार्मिक कहानी. यह उपन्यास इतना प्रभावशाली था कि 1998 में गोविंद निहलानी ने इसी पर फिल्म बनाई, जिसमें जया बच्चन ने मुख्य भूमिका निभाई.
- रुदाली (Rudali, 1993) — गरीबी, स्त्री-शोषण और दलित जीवन की कथा. इस पर भी 1993 में फिल्म बनी, जिसमें डिम्पल हायाती और राखी गुलजार ने अभिनय किया.
- अरण्येर अधिकार (Aranyer Adhikar, 1977)— बिरसा मुंडा के नेतृत्व में आदिवासी विद्रोह की ऐतिहासिक कथा, जिसमें जंगल और भूमि पर अधिकार की लड़ाई को उकेरा गया.
- झाँसी की रानी (Jhansir Rani, 1956)— उनकी पहली प्रमुख कृति, रानी लक्ष्मीबाई की काल्पनिक जीवनी, जिसमें लोककथाओं और इतिहास का मिश्रण है.
- द्रौपदी— एक शक्तिशाली कहानी, जिसमें आदिवासी स्त्री के प्रतिरोध को दर्शाया गया, जो बाद में नाटक और फिल्मों में रूपांतरित हुई.
महाश्वेता देवी का लेखन संवेदनशील होने के साथ वैचारिक भी था. वे कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थीं, लेकिन उनका फोकस हमेशा हाशिए पर पड़े लोगों पर रहा—लोधा, शबर, संथाल जैसे आदिवासी समुदायों पर. उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से भी शोषण की रिपोर्टिंग की, ‘बर्तिका’ जैसी पत्रिका चलाई और आदिवासी अधिकारों के लिए आंदोलन चलाए. उनका मानना था कि “लेखन सक्रियता है” (Writing is activism).
पुरस्कार और सम्मान:
- ज्ञानपीठ पुरस्कार (1996) — भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान.
- रामोन मैग्सेसे पुरस्कार (1997) — एशिया का नोबेल माना जाता है.
- पद्म विभूषण (2006) और कई अन्य राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मान.
महाश्वेता देवी की विरासत सिर्फ साहित्य में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, स्त्री-आदिवासी अधिकार और मानवीय संवेदना के संघर्ष में बसी है. इस शताब्दी वर्ष में जब हम उन्हें याद करते हैं, तो याद आता है उनका वह कथन:
“जीवन गणित नहीं है और मनुष्य राजनीति के लिए नहीं बनाया गया.”
उनकी रचनाएँ आज भी हमें सवाल करती हैं. क्या हमने उन शोषितों की आवाज सुनी है, जिनके लिए वे जीतीं और लड़ीं?
महाश्वेता देवी अमर हैं. उनकी कलम में, उनके संघर्ष में, और उन लाखों हृदयों में जो आज भी अन्याय के खिलाफ खड़े हैं. 14 जनवरी 1926 को जन्मीं यह विलक्षण लेखिका, समाजसेवी, कार्यकर्ता और क्रांतिकारी आवाज 28 जुलाई 2016 को कोलकाता में हमें छोड़ गईं, लेकिन उनकी रचनाएं, उनकी लड़ाई और उनकी संवेदना आज भी जीवित है.
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