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‘गोदान’ सिर्फ फिल्म नहीं, समाज को झकझोरने वाला संदेश है; आलोक कुमार ने बताया क्यों जरूरी है पूरे देश में एक समान गौ-कानून

VHP के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने फिल्म ‘गोदान’ को गौ-रक्षा, गांधी-विवेकानंद के विचारों और संस्कृति से जुड़ा एक सशक्त सामाजिक संदेश बताया है.

विश्व हिंदू परिषद (VHP) के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने हाल ही में एक ऐसी फिल्म का जिक्र किया है, जो समाज की सोच को झकझोरने का दम रखती है. फिल्म का नाम ‘गोदान’ है, जो 6 फरवरी को देशभर के सिनेमाघरों में दस्तक देने जा रही है. इसका ट्रेलर और पोस्टर देखकर यह लग रहा है कि यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश है.

आलोक कुमार ने इस मौके पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की उन बातों को याद किया, जिन्हें अक्सर हम भूल जाते हैं. उन्होंने कहा कि ‘गांधी जी के लिए ‘स्वराज’ (आजादी) से भी ज्यादा जरूरी ‘गौ-रक्षा’ थी. गांधी जी खुद गाय की सेवा करते थे और उनका मानना इतना गहरा था कि उन्होंने गाय का दूध पीना तक छोड़ दिया था, क्योंकि वे मानते थे कि दूध पर पहला हक उसके बछड़े का है.’

1966 का वो काला दिन

बातचीत के दौरान माहौल तब थोड़ा भावुक हो गया जब आलोक कुमार ने 7 नवंबर 1966 की उस ऐतिहासिक घटना का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि कैसे संसद भवन के सामने गौ-रक्षा की मांग कर रहे साधु-संतों और आम लोगों पर बिना किसी वजह लाठियां बरसाई गई और गोलियां चलीं. वह मंजर आज भी गौ-प्रेमियों के जेहन में ताजा है. उनका कहना है कि इतने दशकों बाद भी देश में पूरी तरह से गौ-रक्षा का सपना अधूरा है.

कानून और सांस्कृतिक चुनौतियां

आज की कड़वी सच्चाई यह है कि गौ-रक्षा को लेकर हमारे देश में एक जैसा कानून नहीं है. आलोक कुमार ने बताया कि संविधान में यह राज्यों का विषय है, जिसकी वजह से केंद्र सरकार कोई सख्त फैसला नहीं ले पाती. कई राज्यों में आज भी गौ-हत्या पर रोक नहीं है, जिसे उन्होंने भारतीय संस्कृति के लिए एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बताया.

पंचगव्य से धरती और शरीर दोनों स्वस्थ

स्वामी विवेकानंद का हवाला देते हुए उन्होंने साफ कहा कि भारत में गाय को महज एक जानवर के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, वह ‘मां’ के समान पूजनीय है. उन्होंने इसके पीछे के विज्ञान और फायदों को भी गिनाया:

  • प्राकृतिक खेती: देसी गाय के जरिए रासायनिक खाद से मुक्ति मिल सकती है.
  • पंचगव्य और औषधि: गोबर और गोमूत्र से ऐसी दवाइयां और उत्पाद बन रहे हैं, जो इंसान और धरती दोनों के लिए वरदान हैं.
  • कीटनाशक मुक्त फसल: जहर मुक्त खेती की ओर कदम बढ़ाने का सबसे बड़ा जरिया गाय ही है.

फिल्म ‘गोदान’ से उम्मीदें

आलोक कुमार का मानना है कि फिल्म ‘गोदान’ इन सभी गंभीर विषयों को आम जनता तक पहुंचाने का एक बेहतरीन जरिया बनेगी. उन्होंने फिल्म की पूरी टीम को बधाई दी और उम्मीद जताई कि यह फिल्म सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी छाप छोड़ेगी.

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-भारत एक्सप्रेस



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