जब कोई इंसान पिता बनता है तो पूरे परिवार में जो खुशी होती है उसे बयां नहीं किया जा सकता है. लेकिन पाली जिले के देसूरी क्षेत्र में एक ऐसा गांव है, जहां ‘बाप’ बनना किसी कड़ी परीक्षा से कम नहीं है. काणा गांव में रंगपंचमी के मौके पर एक ऐसी परंपरा निभाई गई, जिसे देखकर एक पल के लिए आपकी रूह कांप जाएगी, लेकिन अगले ही पल आप यहां के लोगों की आस्था देखकर दंग रह जाएंगे. इसे स्थानीय भाषा में ‘सांपा गेर’ कहा जाता है.
गीली लकड़ियां और नए पिताओं की शामत
सोचिए, आपने अभी-अभी पिता बनने का सुख पाया है और पूरा गांव आपको बधाई देने के बजाय आपकी ‘कुटाई’ की तैयारी कर रहा हो! काणा गांव में पिछले एक साल के भीतर जो युवक पहली बार पिता बने हैं, उनके लिए रंगपंचमी का दिन किसी रणक्षेत्र से कम नहीं होता.
परंपरा के मुताबिक, गांव की महिलाएं दोपहर में ही ‘आंकड़े’ (आक) के पेड़ की कच्ची और लचीली लकड़ियां तोड़कर घरों में छिपा देती हैं. शाम होते ही गांव के चौक पर करीब 50 फीट लंबा एक इंसानी गलियारा बनाया जाता है, जिसमें दोनों तरफ महिलाएं लाठियां लेकर मोर्चा संभाल लेती हैं. जैसे ही कोई नया पिता इस रास्ते से गुजरता है, उस पर गीली लकड़ियों की बौछार शुरू हो जाती है.
नारियल छीनने की ‘अग्निपरीक्षा’
इन युवकों को लकड़ियों की मार सहते हुए गलियारे के दूसरे छोर तक पहुंचना होता है, जहां दीवार पर रस्सी से नारियल बंधे होते हैं. युवक को वहां से नारियल तोड़ना होता है और फिर उसी मार को सहते हुए वापस सुरक्षित बाहर आना होता है.
दिलचस्प बात यह है कि इनाम भी परिवार के हिसाब से तय है. अगर कोई दो बेटों का पिता बना है, तो उसे चार आधे नारियल मिलते हैं, और बेटी के पिता को दो आधे नारियल दिए जाते हैं. मार इतनी तेज होती है कि आवाज दूर तक सुनाई देती है.
पिटाई को क्यों मानते हैं आशीर्वाद?
बाहरी दुनिया के लिए यह हिंसा लग सकती है, लेकिन काणा गांव के बुजुर्गों के लिए यह उनके पुरखों की धरोहर है. ग्रामीणों का मानना है कि यह मार दरअसल एक सुरक्षा कवच है. ऐसी मान्यता है कि इस रस्म को निभाने से पिता और संतान पर आने वाले भविष्य के संकट टल जाते हैं.
इस आयोजन के दौरान गांव की छतों, छज्जों और दीवारों पर हजारों की भीड़ जमा हो जाती है. ढोल-नगाड़ों की थाप और हुड़दंग के बीच जब यह ‘सांपा गेर’ शुरू होती है, तो माहौल में एक अलग ही रोमांच भर जाता है.
-भारत एक्सप्रेस
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